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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 978

( ११० )

कबीरबानी

गुरुसों अंतर कबहु न राखै । प्रेमप्रीतिसों दीनता भाखै ॥
गुरुको निंदै अक्षरकू ध्यावै । बिन गुरु अक्षर कैसे पावै ॥
गुरु संगाती शब्द लखावै । जाके बल हंसा घर आवै ॥
गुरुस्वाती, गुरुरूप स्वरूपा । गुरु पार्स है आदि अनूपा ॥
गुरुभृङ्गी गुरु सो बहुरंगी । कीटते करही आप हितसंगी ॥
गुरु है सांचे सिद्ध समाना । गुरु मलयागिर वास प्रमाना ॥
गुरु सदगुरु दीपक अस होई । ताको सनेह कहों मैं सोई ॥

गुरुसीखको सनेहवर्णन

जैसे स्नेह कमल और भौरा । जैसे स्नेह चन्द्र अरु कोरा ॥
जैसे स्नेह बीन जल अंगा । जैसे स्नेह है दीप पतंगा ॥
जैसे स्नेह मृगा और जन्त्री । जैसे स्नेह चकमक और पथरी ॥
जैसे स्नेह स्वाति और पपीहा । जैसे स्नेह चुम्बकअरु लोहा ॥
जैसे स्नेह मीन अरु नीरा । जल बिछुरै वह तजै शरीरा ॥
ऐसे गुरु शिष्यको सन्देशा । मुक्तिहोय गुरुमिटचो अँदेशा ॥
एते स्नेह सीख सहिदानी । इतने गुरुके तत्व बखानी ॥
गुरुसनेह सीख जो पावै । गुरु रूप होय शिष्य समुद्भावै ॥
गुरुकी दया चलौ रे भाई । बिन गुरु पार न पावै कोई ॥
गुरु सोई सत्य शब्द बतावै । और गुरु कोई काम न आवै ॥

साखी- उपमा कहा दीजिये, पटतर कोहु नाहि ।
पलपल करो जु बन्दगी, छिन छिन देखो ताहि ॥

धर्मदास उवाच

धर्मदास विनती चितलाई । कहनी योग गुरु देहु बताई ॥
योग ध्यान भाखो टकसारा । जीव उतारौ भवजल पारा ॥
कायास्थान आदि ते भाखो । कमलभेद गोयें निजराखो ॥