सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 977, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 977

बोधसागर

( १०९ )

चौपाई

सोरा असंख्य उत्पत्ति पसारा । चार असंख्य शून्य विस्तारा ॥
सात शून्य दोउ बेशून्य कहावै । एकै शून्य कोई विरला पावै ॥
तहांते तीन शून्य भए प्रवाना । आदि अंश शून्य सुरत ठिकाना ॥
तिहिंते तीन भए परकारा । चार सुरतको सकल पसारा ॥
प्रथम शून्य लोकते लागी । तीनिसुरत भए शून्य अनुरागी ॥
आठ अंश अरु वंश पसारा । तहाँ लगि देखो शून्य विस्तारा ॥
इतना जीके होय निन्यारा । ताके आगे लोक हमारा ॥
हम चीन्है और गुरुको सेवै । कर्म तोड़ि के जुग जुग जावै ॥
लोक वेद कुल माया धारी । काल फंद यम फंद विचारी ॥
निसदिन सुरत सतगुरुसों लावै । साधु संतके चितहि समावै ॥
जनपर दाय़ा सतगुरु केरी । तिनकी कटै कर्मकी बेरी ॥
करनी कर अभिमान भुलाई । तब छूटै यम धरि ले आई ॥
करनी करिये गुरुके साथ । ताकु काल उठि नावै माथा ॥
करनी करी जो होय अधीना । ताको वासा लोकमें दीन्हा ॥
करनी करे निज सुतं लगावै । ताको सुकृत लोक पहुँचावै ॥
करनी करत कसरि होय आई । तबहि काल घर बाजु बंधाई ॥
सेवा करि राखे मन आसा । तन छूटै जीव परिहै सासा ॥
सद्गुरुसों अभिमान जो करिहै । तन छूटै जीव यमफंद परिहै ॥
बंस टेक औ नाम हमारा । पथ पूजा सद्गुरु कनहारा
चारों अंश चिन्है जो पावै । तनमन धनसों प्रीति लगावै ॥
माता पिता बंधु सब भाई । पुत्री पुत्र हेतु लोलई ॥
घरकी घरणी पुरुष है सोई । इनकी प्रीति न कारज होई ॥
तासों काल रहै मुख गोई । नारी पुरुष सुरति कारज होई ॥