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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 979

बोधसागर

( १११ )

साखी-कहै धर्मदास

तुमही करता आदि हो, जिन सब रचना कीन्ह ।
सत्य शब्द सार निर्मौलिके, सतगुरु साँचे दीन्ह ॥

कहै कबीर योग विधि बानी । जाते पुरुष सो हो पहिचानी ॥
प्रथम कमल कहूँ रे भाई । चारि पंखुरी तोहि बनाई ॥
सिद्ध पवन गनेस है सोई । छेसे जाप अखंडित होई ॥
दुतिय कमल नाभी तर होई । षष्ठ पंखुरी ताकर सोई ॥
ब्रह्मवास तेहि कमलमें होई । छे हजार जाप तहां सोई ॥
६००० । २ तिसरे कमलकी आठ पंखुरी । लक्ष्मीनारायण
मूर्ति तहां धरी ॥ छे हजार जप तहां प्रमाना । जो कोई साधू साधे
प्राणा ॥ ६००० चौथे कमल शक्ति शिव रहिऊ ॥ षट सहस्र
जप तहां कहिऊ ६००० ॥ बारा पँखुरी ताकर भाई । सोहैं तत्त्वमें
ध्यान लगाई ॥ पांचे कमल अकाशको बासा । सोरा पँखुरी
तहां निवासा ॥ अमी चन्द्र है ताकर नामा । सहस्र जाप ताको
विश्रामा ॥ १००० ॥ तहांते कला अवतारकी आवै । चारि वेद ताके
गुण गावै ॥ अबमें छठो कमल कहि भाखों । तीन पंखुरी ताकी
पुनि राखों ॥ परमात्मा ताहि कमलमें रहई । एक सहस्र जाप
तहँ करई ॥ १००० ॥ ६ सहस्र जाप दोए पँखुरी १००० षष्ठ ध्यान-
तिहिभीतर धरी ॥ गम्य अगम्य अंश दो रहई । तीन देव तहँ
लगि कहई ॥ आठेक मल दश पखुरी कहिये । अगिन वान ताके
बल कहिये ॥ कामदहन ताको है नामा । जो लखेसो पावै विश्रामा
प्रकाश

नामो कमलकी अविगत बानी । अन्त पाँखुरी ताकर प्रानी ॥
ता मैं पूर्ण ब्रह्म अखण्डा । निसवासर धरणी नहिँ चन्दा ॥
एक नाम सत्य है बानी । ताहि नाम सृष्टी उत्पानी ॥