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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 927

बोधसागर

( ५९ )

अब भवमें मैं बहुरि न आऊँ । तुमरे चरणकमल चित्त लाऊँ ॥
येती युक्ति न काहू पाई । सो साहिब तुम मोहि लखाई ॥
जान परी मोहि तुम्हरी बाता । तुम सम और न कोई ताता ॥
चौरासी सो कीन्ह उबारा । बहुरि जन्म नहिं होय हमारा ॥
समझ बूझ करिहौं सिवकाई । छाँडो कुलकी लाज बड़ाई ॥
परदा तो रहिया क्षण माहीं । जगमें कोई काहू को नाहीं ॥
अपने अपने स्वारथ आई । परमारथ काहू नहिं पाई ॥
ये सब जगत निरंजन माहीं । पाँच तीन सो सब उपजाई ॥
पाँच तत्त्व तीन गुण भारी । इन ते युक्त दिखाई नारी ॥
पानी पवन पृथ्वी आकाशा । सब पर तेज किया परकाशा ॥
रज तम सत तीनों गुणजाना । ब्रह्मा विष्णु महेश बखाना ॥
साखी-पाँच तीन पर अहि निरंजन, यह मायाको ठाट ।
तासों सब रचना करी, भांति भांतिकी घाट ॥

सद्गुरु वचन

चौपाई

कहे कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद मैं किया प्रकासा ॥
तुम सन अन्तर कछू न राखा । जो कछुहता सो कछु सब भाखा ॥
अब तुम भक्ति करो दृढ़ताई । छाँड़ि देव कुललाज बड़ाई ॥
पहिले कुल मर्यादा खोवे । भव सो रहित भक्ति तब होवे ॥
कुल की भय सबही को भारी । कहाँ को पुरुष कहाँ की नारी ॥
ताते यम को बन्धन कीन्हा । काज अकाज न काहू चीन्हा ॥
ताते परदा दूर निवारो । सेवा करो सत्य मन धारो ॥
परदा साथ काल की गांसी । यह बन्धन दुनियाँ सब फांसी ॥
राजा परजा बड़े कुलीना । परदे काल मर्म नहिं चीन्हा ॥
सेवा करो छाँड़ि मन दूजा । गिरही सेवा गिरही पूजा ॥