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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 926

( ५८ )

भवतारणबोध

चौपाई

सुन धर्मनि सब जुगत बखानी । तुम अपने मनमहँ कछु जानी ॥
आदि अन्त सब तुम्हें लखाई । उत्पत्ति परलयकी गति पाई ॥
उत्पत्ति परलय सिरजन हारा । मेरा भेद निरंजन पारा ॥
तासे जगत न काहू माना । तातें तोहि कहां मैं ज्ञाना ॥
जो कोई मानै कहा हमारा । सो हंसा निज होय हमारा ॥
अमर करें फिर मरन न होई । ताका खूंट न पकड़ैं कोई ॥
फिरके नहिं जन्में जगमाहीं । काल अकालताहि दुख नाहीं ॥
सुखसागर सुख मूल बतावा । बड़ भागी हंसा काहू पावा ॥
अंकुरी जीव जु होय हमारा । भवसागर तें होय नियारा ॥
प्रणहि प्रतीत करो मन लाई । ताको यह पद देय लखाई ॥
सुर्तवंत साँचा जी होई । शरण तुम्हारी गहिहै सोई ॥
साखी-प्रथमहि दृढ़ प्रतीत है, होय भक्ति अंकुर ।

भाव प्रीति सेवा करे, देउ ज्ञान भरपूर ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी मैं तुमको चीन्हा । आदि अन्त भेद सब लीन्हा ॥
तुमहीं वार तुमहिं हो पारा । तुमहीं सों उपजो संसारा ॥
तुमहीं हो निज पहिले पारा । तुमहीं सकल जगत सो न्यारा ॥
गुप्त प्रकट मैं सब विधि जाना । तुम हीं हो तहैं पद निरवाना ॥
ऐसी अगम गम्य तहैं नाहीं । मैं बूझो अपने मन माहीं ॥
पूरण कृपा करी तुम साई । मेरे मन कछु संशय नाहीं ॥
भव तारण तुम संशय वारण । धर औ अघर दोनोंके धारण ॥
समर्थ सब गति पायउ तोरी । अब सब संशय भागी मोरी ॥
भयो सनाथ तव दर्शन पाये । माया छूट परम पद पाये ॥
छूटा काल निरंजन मोरा । जन्म मरणके टूटे डोरा ॥