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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 928

( ६० )

भवतारणबोध

गुरुओं कपटे करै चतुराई । सो हँसा जग भरमें आई ॥
ताते गुरु सों परदा नाहीं । परदा करै रहै भव माहीं ॥
गुरु है मात पिता गुरु सेवा । गुरु सम और नहीं कोई देवा ॥
गुरु है खसम और नहीं दूजा । जाने अश हंस गुरु पूजा ॥
गुरुओं परदा कबहुँ न करिये । सर्वस ले गुरु आगे धरिये ॥
साखी-गुरुकी महिमा को कहे, शिव विरंचि नहीं जाम ।
गुरु सतगुरु को चीन्हियां, ते पहुँचे निज धाम ॥

चौपाई

धर्मदास सुन जुगत बताऊँ । चौक आरती तोहि लखाऊँ ॥
अगर चन्दनका चौका दीजै । ज्योति बराय आरती कीजै ॥
पांच तत्व पांचों है बाती । बाहर भीतर ज्योति समाती ॥
मानिक दीपकका उजियारा । यहि बात जाती बिस्तारा ॥
श्वेतपात ले हो सुख भारी । श्वेत खटाई श्वेत सुपारी ॥
यही विधि चौका विस्तारी । मेवा अष्ट आन तहँ धारी ॥
मेवा कदलि कपूर मंगावो । कदली फल सोई ले आवो ॥
पुष्टि फूल सुगन्ध सवारो । भांति भांति व्यंजन अनुसारो ॥
तनमन धन तब अर्पण कीजै । प्रेम सहित ऐसो सुख लीजै ॥
पांच तत्व को भोजन कीजै । ब्रह्म आत्महि तुस करीजे ॥
काया माया को सुख येही । यह सुख करके मिलो विदेही ॥
मिलो विदेह देह धर नाहीं । बूझ लेहु तुम यह मन माहीं ॥
अब कष्ट कहनेको नहीं रहिया । युक्ति हती सो सब हम कहिया ॥
भव छूटन को यही उजागर । याही विधि उतरे भवसागर ॥
सत्य सत्य यह बात हमारी । जो कोई समझ करै नर नारी ॥
भक्ति करै मुक्ति फल पावे । हमरे सत्य लोकमें आवे ॥
कहे कबीर सुनहु धर्मदासा । छूटै कर्म भर्म सब फांसा ॥