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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 474

(३०)

ज्ञानप्रकाश

नाम कबीर जपो दिनराती । तजहुकर्म भ्रमअरु कुलजाती ॥
प्रतिमा धोखा दूरि बहावो । आतम पूजा नाम चितलाओ॥
पीतर पाथर दूरि बहाऊ । सद्गुरु सन्त सेवा चित लाऊ॥
तब जमरा तोहीं नहिं पाई । नाम प्रताप काल सुरझाई ॥
होइहैं जीव काज तब तोरा । निश्चै वचन मानु दिठ मोरा ॥

धर्मदास वचन

हे साहब मैं तब पग धरऊँ । तुम्हते कछु दुबिया नहिं करऊँ॥
अब मोहि चिन्हि परायम बाजाँ । तुम्हते भयउ मोर मन राजी ॥
मोरे हृदय प्रीति अस आई । तुम्हते होइहै जिव मुक्ताई ॥
तुमहीं सत्यकबीर हो स्वामी । कृपा करहु तुम अन्तर््यामी ॥
हे प्रभु देहु प्रवाना मोहीं । यम तृण तोरि भजौ मैं तोहीं॥
मोरे नहीं अवर सो कामा । निसिदिन सुमिरों सद्गुरु नामा ॥
पीतर पाथर देव बहायी । सद्गुरु भक्ति करब चितलायी ॥
अरपौं शीस सर्वस सब तोहीं । हे प्रभु यमते छोडावहु मोहीं॥
सन्तन्ह सेवा प्रीति सों करिहैं । वचन शिक्षापन निश्चय धरिहैं॥
जो तुम्ह करहु करब हम सोई । हे प्रभु दुतिया कबहुँ नहिं होई॥

जिन्दा वचन

सुनु धर्मनि अब तोहीं मुक्ताओ । निश्चै यमसों तोहिं बचाओ ॥
देइ परवाना हंस उबारो । जनम मरण दुख दारुण टारो ॥
ले प्रवाना जो करै प्रतीती । जिन्दा कहै चले यम जीती ॥
अब मोहि आज्ञा देहु धर्मदासा । हम गवनहि सद्गुरुके पास ॥
सद्गुरु संग आइब तव पाहीं । तब परवाना तोहि मिलाहीं ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु अब तोहिं जाने न देहौं । नहिं आवो तो मैं पछितैहौं ॥
पछताइ पछताइ बहु दुख पैहौं । नहिं आवहुतो प्राण गवैहौं ॥
हाथके रतन खोइ कोइ डारे । सो मूरख निजकाज विगारे ॥