कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
(२९)
काल रूप धरि गुरु कहावै । करि पारख तासो हरिजावै ॥
अन्धविश्वास जगतसो सोवै । जाय नरक पुनि मूलहु खोवै ॥
निरखि परखिकै शरणै जावै । अगम निगम सब सोई जनावै॥
रहै अजाचक नामलौ लाई । जीव दया सन्तन सेवकाई ॥
निजआतमसम सबही जानौ । प्रेम प्रीतिसे सेवा ठानौ ॥
परमारथकी भिक्षा करिये । गुरु साधुन आज्ञा अनुसरिये॥
अभ्यागत आतम सम जाने । साधुनाम सद्गुरु सहिदाने ॥
छंद-गुरुसाधु महिमा अमित अगम अपार पारनहिं कोऊ लहै॥
त्रीदेव दश औतार हरि गुरु साधु पद रज तेऊ चहैं ॥
सनकादिक सुरनरमुनि सिद्धि ज्ञानीसाधु गुरु आतित रहै॥
हरि आपु मुख महिमा प्रकाशें निगम अस्तुति नित कहै ॥
सारखी-अस नर पाँवर अन्धमति, हृदय न करहिं विचार ॥
गुरु सन्तन्ह पद सारतजि, विष वेली प्रतिपार ॥
सोरठा-सुत नारी हित प्रान, गुरु सन्तन्ह सो चातुरी ॥
जब यम बाँधै तान, तब पछितावहि सुगुध नर ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
धन सतगुरु धन तुमरी बानी । मोहिअसअधमदीन्हगतिजानी
अब साहब मोहि आपन करहु । मम शिरचरणसरोरुह धरहु ॥
मैं आपन दिन शुभकरि जाना । तोहरे दरश मोक्ष परमाना ॥
अब अस दया करहु दुखभञ्जन । कबहुँमोहिनधरिपाव निरञ्जन॥
जिन्दा वचन
अहो धर्मदास दरश तुम पावो । शब्द गहे होय जिवमुक्तावो ॥
यमफन्दा तब निश्चै छूटै । जब यमरासो तिनका टूटै ॥
अमीअंक परवाना पावै । सुमिरण नामध्यान चितलावै॥
हियते और आस सब छोडे । सद्गुरु चरण नेह चित माडे ॥