कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानसागर
( १९ )
अंश बारि महाँ पाये जबहीं । कन्या तीन उत्पन्न भई तबहीं॥
पाय कन्या तब भये आनन्दा । देवी पास चले तिय संगा ॥
ले कन्या तब आगे कीन्हा । कर जोरें प्रणाम मन दीन्हा ॥
सारखी-हे माता यह कन्या, पायो सिन्धु मझार ॥
जस कछु आज्ञा कीजिये, तस कछु करब विचार ॥
भवानी वचन चौपाई
कहे भवानि सुन ब्रह्म कुवॉरा । कामिन के तुम सदा भरतारा ॥
सावित्री ब्रह्मा कहैं दीन्हा । लक्ष्मी कृपा विष्णु पर कीन्हा ॥
पारवती रहि संकर पाँहीं । अटल अहिवात करचो भवमाहीं॥
पायो कामिनि भयो हुलासा । बहुरि विनय कियो देवी पास ॥
हे माता तुव आज्ञा सारा । जो कछु कहाँ सो करो विचारा ॥
कहे भवानी सुन ब्रह्म कुवॉरा । जाइ मथो अब सागर खारा ॥
पढ़ौ वस्तु सो आनहु जानी । अस कछु बोली आदि भवानी ॥
चले देव त्रिय लाग न वारा । मथयो सिन्धु करि हर्ष अपारा ॥
पाये वेद ब्रह्मा सो लीन्हा । विष्णु भाव सो हमहू चीन्हा ॥
सारखी-चार वेद ब्रह्मा लिया, अमृत विष्णु सम्हार ॥
मथे अनिल जो विष भया, सो लीन्हा त्रिपुरार ॥
चौपाई
यह चरित्र त्रय देव बनाया । यहि सुधि दैत्य सुने जब पाया ॥
आइ कीन्ह सब बाद विवादा । पायहु वस्तु देहु मोहिं आधा ॥
वेद अनिल विष सब तुम लेहू । सुधा आहि सो हम कहैं देहु ॥
कहैं विष्णु सुन दैत्य अधीरा । सदा खाइकर विपति शरीरा ॥
दोनो मिल अस कीन्ह विचारा । सब मिल खईये अमृत सारा ॥
दोई पांति बैठे भल जोरी । दैत्य देव तैंतीस करोरी ॥
विष्णु चरित काहू नहिं जाना । बाँटत अमृत छल जो ठाना ॥