कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २० )
ज्ञानसागर
साखी-देवन अमृत पानयो, काहु न कीन्ह प्रसाद ॥
बांटत राहु तब ग्रस्यो, चन्द्र भानु कियो वाद ॥
चौपाई
जब सब मिलिकै आयसु पाई । सभा बैठ कैसे कै खाई ॥
सुनकै विष्णु क्रोध तब कीन्हा । चक्र मार राहु सिर छीना ॥
अमृत परचो ताहि के पेटा । शीश के राहु देह सो केता ॥
भयो युद्ध दोनों दल भारी । बहुत दिन लरे जो बैर सम्हारी ॥
चन्द्र भानु जो राहु सुरावा । आसै जान बैर को भावा ॥
यह चरित भयो सागर तीरा । देवी पास चले त्रय वीरा ॥
तब देवी अस मतौ विचारा । रचहुँ सृष्टिजग होइ उजियारा ॥
अंडज माता किया उत्पानी । पिंडज भाव ब्रह्मा को जानी ॥
उष्मज विष्णु कीन्ह व्यवहारा । शिव कीन्हौ रोम अठासी धारा ॥
लख चौरासी योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
साखी-जलके जीव पताल सब, औ पृथ्वी परचंड ॥
रचो अहार शंभू सबै, वनस्पती को अंग ॥
चौपाई
स्थावर मदेश जो कीन्हा । उष्मज दोइ तत्त्व कर चीन्हा ॥
तीन तत्त्व अंडज मैं दीन्हा । चार तत्त्व पिंडज को कीन्हा ॥
मुक्ति क्षेत्र नर कौ अवतारा । ता महँ पांच तत्त्व हैं सारा ॥
और जो इन में बरतै भाऊ । मनुष्य जन्म में प्रगट स्वभाऊ ॥
मनुष्य जन्म उत्तम सो होई । विना नाम पुनि जाइ बिगोई ॥
स्वासा सार तै वेद जो भएऊ । सो पुनि मीन पास ले धरेऊ ॥
एकहि सुरति तब ब्रह्मा पावा । तेहि पढिबे का मन चितलावा ॥
वेद पढ़त बूझ अस परेऊ । पृथ्वी आकाश जोत अनुसरेऊ ॥
साखी-निराकार निरंजन, सृष्टि कीन्ह उत्पान ॥
मैं जानौ भल मरेंम अब, नहि कीन्हौ आदि भवान ॥