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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 28

( १८ )

ज्ञानसागर

चल्यो ब्रह्मा मातहिं सिरनाई । सोच रह्यो कस करब उपाई ॥
बहुतक जने परिश्रम कीन्हा । चलो प्रस्वेद सोइ पगु चीन्हा ॥
साठ सहस्र बुन्द अनुसारी । बुन्द प्रभाव सबै नख धारी ॥
नख धारिन स्तुति अनुसारा । कहा कैर सुन पिता हमारा ॥

ब्रह्मा वचन

साखी--खनहु सिन्धु मम वचन इम, मन्त्र कहौं समुझाय ॥
माटी उठे जु खनत महैं, ता कह घालिब खाय ॥

चौपाई

चतुर रूप कीन्हा तिन चारी । कहौं नार सबते अधिकारी ॥
रचा सिन्धु कछु लागिनबारा । सागर सात रच्यो विस्तारा ॥
सागर नीर जब भयो प्रकाशा । नख धारिन तब काल गरासा ॥
सागर रचि ब्रह्मा अनुरागा । अडसठ तीरथरचन तबलागा ॥

साखी-गङ्गा यमुना सरस्वती, गोदावरी समान ॥
रची नदी तब गंडकी, जहैं तहैं शिल उत पान ॥

चौपाई

सालिग्राम गंडक अंकूला । पांहन पूजत पंडित भूला ॥
और नर्मदा नदी गोदावरी । सोनभद्र पुनि करमनासावरी ॥
और अनेक रच्यो विस्तारा । जाते भूल पर्यो संसारा ॥
सिन्धु सम्हार गये देवी ठाऊं । चतुर मुख आन गहे तब पाऊं ॥
हे माता आज्ञा तुम मानी । रच्यो सिंधु तुव वचन प्रवानी ॥

भावानी वचन

मथौ सिन्धु सुत कहा हमारा । वहि में पैहौ कामिनि वारा ॥
तीनों जनै चले सिर नाई । मथन सिन्धु कस करब उपाई ॥
पर्वत आनि मथनियां कीन्हा । फनपति लेह फाहरी दोन्हा ॥
मथतहि सिन्धु मतो अस कान्हा । आपन अँश उतपानहि लीन्हा ॥