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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2125

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जीवधर्मबोध

( २०४७ )

सत्य कबीरके नाम जो चारो । चहुँयुगमें भिन्न भिन्न उचारो ॥
सत्य सुकृत सुनींद्र कहाये । करूनामय स्वामी बतलाये ॥
कलियुग माह कबीर उचारो । चारों युगके नाम हैं चारो ॥
नाम संस्कृतमें युग तीनी । कलियुग मिश्रीत करि दीनी ॥
अरबी संस्कृत मिश्रीत कबीरा । हिन्दू सुसलमान गुरु पीरा ॥
जेते और कबीरके नाऊ । सबही संस्कृत माह कहाऊ ॥
सतये स्वसंवेद कह येही । अज हरि हर मथुरा धर देही ॥
तीनों देव पिता सब नरके । तीन लोक ब्रह्मा हरि हरके ॥
ब्रह्म श्वासते वेद उपानी । उचरे तीन देव सुख बानी ॥
संस्कृत सुर बानी होई । ताते श्रेष्ठ और नहिं कोई ॥
इति देश

अथ ब्रह्मा और आदमकी एकता—चौपाई

ब्रह्मा आदम एकै अहई । सत्यकबीर बचन अस कहई ॥
ब्रह्मा सावित्री नर नारी । आदम होवा ताहि पुकारी ॥
ब्रह्माको काशीमें वासा । अदनवाग सो नाम प्रकाशा ॥
काशी सम कोइ पुरी न आना । देखो काशी खंड प्रमाना ॥
बन अनंद पथमें कहलाया । वाराणसी बहुरि बतलाया ॥
नाम तासु कहिये पुनि वासी । सब अनंद सब सुखकी रासी ॥
वाराणसी सो भयो बनारस । सुखसे सावित्री ब्रह्मावस ॥
आदिमें कहे जो वन आनंदा । अरबी अदनबाग सुखकंदा ॥
वन है बाग अरबकी भाषा । नाम अनंद अदवसों राखा ॥
उलटि आनंद अदन हो सोई । कहे अरब पारसके लोई ॥
संस्कृतकी बोली बहुतेरी । अरब लोग उलटा कहि टेरी ॥
वन अनंद बाग अदन जो भैऊ । वाराणसी बनारस कहेऊ ॥
अरब न संस्कृत सके उचारी । उलटा सुलटा सो करि डारी ॥
इति आदमब्रह्मा