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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2124

( २०४६ )

बोधसागर

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इत जो देव गणेश बखानी । सो गम्मस रूमी यूनानी ॥
इंद्रको हिन्दू कह देव पितर । उत जु पितर कह लाववप्रधर ॥
हिन्दू अनपूर्णा कह भाषी । अनपूर्णा यूनानी साषी ॥
संस्कृतमें जो पित्र कहावै । सोई पारसी पितर बतावै ॥
अंग्रेजीमें फादर सोई । मातर मादर कहिये जोई ॥
आता प्रादर नाम कहीजै । कृतकार कृतगार भनीजै ॥
अंग्रेजी कृयटार कहावै । हिन्दू सो करताहि बतावै ॥
मिह संस्कृत सूरज भाषा । अरबी मिह नाम सोइ राखा ॥
अब्र संस्कृत बादल बोले । अब्र पारसीमें सोइ खोले ॥
पुत्र संस्कृत सुअन कहावै । अंग्रेजीमें सन बतलावै ॥
पृष्ठ पारसी पुस्त प्रमाना । नैन सो अबीऐन बखाना ॥
सृष्टि संस्कृत कीन बखाना । सो पारसी सरिस्त प्रमाना ॥
दुहिता संस्कृत बेटी होई । सो पारसी दुखतर कह सोई ॥
सो डाटर अंगरेजी माहीं । अस्व अस्य लो हार्स कहाहीं ॥
शब्द अनेक बकी यक ताई । बुधवन्तो सो लेहु मिलाई ॥
भाषा बहुत पढ़े जो कोई । बोलके मेल मिलावै सोई ॥
अब तृतिये दृष्टांत निरेखे । संस्कृत व्याकरण परेखे ॥
जो व्याकरण संस्कृत माहीं । ऐसो शुद्ध और कई नाहीं ॥
संस्कृतसे है अरबी बानी । मिश्री यूनानी अलेनानी ॥
संस्कृतसे सब गुण महि सारी । उक्ति युक्ति कछु भिन्नसवारी ॥
अब चौथे यह भाषो भेदा । सर्व शास्त्रके प्रथमहि वेदा ॥
चारो महा बाल है जोई । संस्कृतमें पुनि उजरी सोई ॥
पुनि पञ्चम अस कहो बखानी । ताते आदि संस्कृत जानी ॥
मुख्य नाम परमेश्वर केरा । संस्कृत की बोलीमें हेरा ॥
और बोलमें आवत नाहीं । संस्कृतमें शुद्ध गहाहीं ॥
अब छठये यहि विधिते सुनिये । ताते आदि संस्कृत गुणिये ॥