कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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अथ मनुशतव्रता और नूहकी एकता-चौपाई
मनुशतव्रता नूहको जानी । पल्लय पयोध जो राख्यौ प्राणी ॥
नाव बहेतरा मनु नृपाला । रच्यौ बचावनजिव तेहिकाला ॥
ताही बहेत्रा सकल चढ़ाई । तेहि औसर जल परलय आई ॥
तब हरि लियौ मीन औतारा । दौय सींग निजु शीशमें धारा ॥
मीन रूप जो विष्णु बनाई । ताहि बहेत्रा शृंग लगाई ॥
भलिबिधि बांधे बहेत्रा ताही । निजु बलते गहि राख्यौ वाही ॥
नाव बाँधि हरि आन्हा दैऊ । मनुजाये तह आसन गहेऊ ॥
लीने सप्तऋषी निजु संगा । आठ जीव बैठे यहि ढंगा ॥
चहुँ दिश तबहि जलामय होई । भे संहार बचा नहिं कोई ॥
तरे बहेत्रा जलके माही । आठो जीव तहां बचि जाही ॥
प्रलैय कीन फिर सृष्टि बसाये । धर्म महम्मद अस बतलाये ॥
प्रलय पिछारी नूह पुकारा । प्रथमें नाम और कछु धारा ॥
आदिको नाम नूह ना होई । बदलि गयौ पीछे ते सोई ॥
इति मनुशतव्रत।
अथ महादेव और महम्मदकी एकता-चौपाई
श्रीमुख सत्यकबीर बखानी । महम्मद महादेव सो जानी ॥
महादेव क्षत्री रन वाके । सोह महम्मदकी है साके ॥
धर्म जासुको शस्त्र प्रहारा । सोई करे सृष्टि संहारा ॥
तमगुण आदिमें वेद बखाना । रुह महम्मद प्रथम उपाना ॥
तमगुण आदि सृष्टिको करता । भवसागर ताते थिर धरता ॥
भव है नाम महादेव केरा । ताते यह भवसागर टेरा ॥
भव भवानी द्वै रूप बनाया । भवसागर सरदारी पाया ॥
शिवके संग नारि द्वै जानी । शीश गंग कटि गौरि भवानी ॥
महम्मदमें मकार द्वै देखो । दोहू नारि तेहि संग विशेषो ॥
दोउ मकार महम्मद नामा । गंग गौरि बरणो वर बामा ॥