कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २०१३ )
अग्नि पौन आदिक जो कहाऊ । इन्द्रके दरवारिनको नाऊ ॥
इन्द्रहि रणमें रावन जीता । बंधन डारिके देतेहि कीता ॥
नृपको जब बंधनमें डारा । मन्त्रिनको कर चेरवा डारा ॥
नीचटहल दरबारिन गहेऊ । अग्नि पौन रावन बस भैऊ ॥
अग्नि पौन आदिक जो कहेऊ । सो सब नाम मनुषको रहेऊ ॥
सुरपति नहीं बंधनमें आवै । मिथ्याती सब कूट बतावै ॥
छनमें इन्द्र प्रलय जग करई । ताहि कौन बंधनमें धरई ॥
प्रलय करे फिर जग प्रकटावै । सो किमि रावनकी बस आवै ॥
ऐसो अग्नि पौन बलकारा । छनमें प्रलय करे संसारा ॥
मिथ्याती सब कूठ वर्णके । अग्नि पौन रह बस रावनके ॥
ब्रह्मन क्षत्री होय लराई । क्षत्री द्विजनको मारि हटाई ॥
परशुराम तब द्विजकुल होई । परमशत्रु क्षत्रीको सोई ॥
ताते अनगिन क्षत्री मारा । तब सुभूमि लीवो औतारा ॥
क्षत्री चक्रवर्त पदधारा । पशुरामको ताने मारा ॥
हनिवर द्वीपकौ राजा जोई । हनोमानको नाना सोई ॥
हनोमान ननिओ रे गैऊ । आदर मान तहां बड़ भैऊ ॥
हनिवर द्वीपमें आदर पाई । ताते हनोमान कहलाई ॥
बानरवंशी क्षत्री सोई । हनोमान विद्याधर होई ॥
रूप अनूप महा छबि जाको । कामदेव औतार है ताको ॥
बज्र अंग बल बरनि न जाई । गुणगणशील जासो अधिकार्ई ॥
राजा पौन जय कहलाये । हनुमान है ताके जाये ॥
पौनते मनुष न जन्मै कोई । यह कपोलकलपित सब होई ॥
हनोमानको बानर भाषा । पीठके ऊपर पूछ सो राखा ॥
कूठ कथा मिथ्याती कहई । नर बानर किमि संगत गहई ॥
बालि सुकंठ आदि नृप जेते । बानरवंशके क्षत्री तेते ॥