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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2092

( २०१४ )

बोधसागर

१०६

यह सब विद्याधर कहलाई । नभकी मारग चलै उड़ाई ॥
चंद्रनखा भगिनी रावनकी । सूपनखा तेहि विप्र कथनकी ॥
ब्रह्मन वेद पुरान बनाई । झूठी कथा अनेक मिलाई ॥
चौथा काल बहुरि जब ऐहै । भिन्नतिथ करतब प्रकटैहै ॥
कृष्णलक्ष्मण आदिक जानू । जरासंध रावण हनुमानू ॥
देव तिथंकर जब प्रकटाई । जैनधर्म सब जीव गहाई ॥
जैनधर्म विधि करनी करही । नर विद्याधर सो मत धरही ॥
अब मिथ्यात फैलि बहु गैऊ । नर विद्याधर अंतर भैऊ ॥
यहि बिधि जैनकथा सब न्यारी । वेदधर्मते भिन्न उचारी ॥
ऐसहि बुद्ध धर्मकी चाली । वेद जैनते कथा निराली ॥

इति श्री जैनमतव्यौरा

अथ स्वसंवेदव्यौरा

दोहा-चारवेदको पिता है, सर्वे धर्म गुरु जोय ।
परम पुरुषको भेद है, स्वसंवेद कह सोय ॥

चौपाई

सत्य कबीरको निज मुख बानी । स्वसमवेदसो नाम बखानी ॥
सतगुणपर जब सतगुण सरसे । तब शिव परम पुरुषपद परसे ॥
ताको नहीं जाने संसारा । अलख अगोचर अगम अपारा ॥
नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण सोई । निर्गुण सर्गुण निरंजन होई ॥
निर्गुण सर्गुण फंदपसारा । सत्यमता है इनते न्यारा ॥
कहुँ न ताको मंदिर सेवा । सबमई परमात्म देवा ॥
जब जिव धर्म कबीर गहंता । बाद बिवाद होय सब अंता ॥
स्वसमवेदकी विधि जो गहई । तामें बहुरि न औगुण रहई ॥
सब औगुणको दूर बहावै । स्वसमवेद विधि तब जिव पावै ॥
इहां न कोई विषयबिकारा । निर्मल जीव सन्त मतधारा ॥