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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2090

( २०१२ )

बीधसागर

१०४

महा कठिन तप करि अघ दहई । दोनों यक समान गुण गहई ॥
पंचये छठये कालमें सोई । जनीसे नहिं सो तप होई ॥
दान देनकी बानि न तिनको । कहु कल्याण होय किमि इनको ॥
धन सो धरहि दान नहिं करही । कौन भांति उनको अघ हरही ॥
ताते पंचये छठये काला । जैनी कोइ न मुक्तिको चाला ॥
तनहित धन दे तन सुख पाई । धन जो गहतौ तन दुख आई ॥
जैनी कहै सुनो रे भाई । मिथ्याती मिथ्या फैलाई ॥
एवनको राक्षस कहि गाया । मिथ्याती सो झूठ बताया ॥
एवन जैनी छत्री सोई । राक्षसनाम वंशको होई ॥
राक्षस वंशी क्षत्री एवन । जैनधर्म ताके मनभावन ॥
ब्राह्मणहिंसा कर अधिकाई । ताते जैन महादुख पाई ॥
यज्ञमें जीव भरूम जब करही । मनमें रोष सदा जब धरही ॥
क्षत्रीवंशके सबही राजा । जैनधर्मधर सहित समाजा ॥
जिवकी हिंसा जबसों देखे । क्रोधवंत धावै यहि लेखे ॥
यज्ञविघ्नेस करे सो आई । ताते ब्राह्मण देहि दोहाई ॥
यहि विधि एवन विप्रविरोधी । हिंसा देखी होय अति क्रोधी ॥
ब्राह्मण ताते वैर गहाई । एवनको राक्षस बतलाई ॥
अमिश अहारी मद्यप भाषे । वैरभावको कारण राखे ॥
वीश बाहु दश शीश बखाना । ताको भेदनसो कहु जाना ॥
एवन सिद्ध मंत्र एक करेऊ । ऐसो भेष ताहिंते धरेऊ ॥
ताके पास रहै एक माला । ताते ऐसो दरसै ख्याला ॥
सो माला जब गलमें डारे । वीश बाहु दश शीस निहारे ॥
मालाको प्रताप बतलाई । भेष भयंकर लेत बनाई ॥
और मनुष सब देखो जैसे । रातन यकशिर द्वैभुज तैसे ॥
इन्द्रनाम यक राजा केरो । मंत्री जुत्थप तासु चनेरो ॥