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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2089

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जीवधर्मबोध

(२०११)

चौथा काल जैनी जो कहेऊ । वज्रशरीर मनुष को रहेऊ ॥
जैनी करहि तबहि तप भारी । करि करनी सुख धाम सिधारी ॥
अब यह काल होयसो नाही । ज्ञान सुक्ति नहिं तिनके पाहीं ॥
परमारथ न होय बिनदाना । गहे साधु परमारथ बाना ॥
जहँ परमारथ दान कि हानी । तहां सुगति पावै कह प्रानी ॥
जैनमते अब सुक्ति न पाई । अन्य धर्म जिवको सुखदाई ॥
पंचम काल जैनको येहा । ज्ञानी सन्त धरे बहु देहा ॥
और धर्ममें जैनमें नाही । जो परमारथ दान कराही ॥
धर्मके चार चरण बतलाया । सत अरु सौच दान अरु दाया ॥
कलिमें कहा सप्त पदवर्ता । नाम दान कलिमल संहर्ता ॥
जैनमें सप्त शौच अरु दाना । तीनों चरण विभंग बखाना ॥
महाकठिनतप करि जब ध्यावत । चौथकाल कोई गति पावत ॥
अब यहि कालसो व्रतको पाले । एक टांगते धर्म न चाले ॥
संबंधी तन मन धन तीनों । यह प्रमान सब धर्महि कीनों ॥
तन मन धन बिन कार्य न कोई । स्वारथ अरु परमारथ दोई ॥
तन मन दे जब कर सेवकाई । तब धन लाभ होय दुनियाई ॥
धनको त्यागि औरको दीजै । तन मन ताते लाभ लहीजै ॥
तन मन धन दे जिहि जिन साधा । कोई दुनिया कोई हरि अवराधा ॥
तिहुदे सोइ अवश्य लहीजै । जब काहू दिश निज दिल दीजै ॥
तिहु बिन कर्म जो साधा चहई । सो शठ हठ अज्ञानी अहई ॥
तजि धन साधु जो वनमें बसही । घोर घोर तप करि तन कसही ॥
धनको दान दंड तिहि नाही । रहे नहीं धन जिनके पाहीं ॥
दारिद्री अरु भिक्षुक जोई । ताते दान लेत नहिं कोई ॥
जिहि औसर नर वज्र शरीरा । सहे परीसा लहै न पीरा ॥
दुःख अनंत देहीपर परही । जप तप साधु गृही दोउ करही ॥