कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2088, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २०१० )
बोधसागर
१०२
अथ जैनधर्म व्यौरावर्णन—चौपाई
जैनधर्मं जिव दाया भारी । हिंसा पंथ नसो पग धारी ॥
शौच क्रिया जैनीमें थोरी । सतगुण मलिन मतामय सोरी ॥
रात समै ढिग जल नहिं घरही । अशुचि शरीर रहै का करही ॥
अशुचि देह नहिं मन सकुचाही । इन्द्रो शुद्ध बिना जल नाहीं ॥
देवी देवकी सेवा साधन । यन्त्र मन्त्र बहु देव अराधन ॥
दिन गति जबहि रैन नियरावै । जल अरु अन्तनसो कछु खावै ॥
प्राण जाय तो जान दे भाई । सुखमें कबहुँ न जल परिजाई ॥
महा कठिन व्रत जैनी ठाना । भूखसे त्यागे अपनो प्राना ॥
जेते इतर धर्म बहु भांती । जैनी सबहि कहै मिथ्याती ॥
जैनेश्वरकी केवल बानी । इतर ग्रंथ नहिं जैनी मानी ॥
दान पुण्य अरु शौच अचारा । जैन धर्म अति अल्प निहारा ॥
दान पुण्य बिन कर्म जो करही । उर कठोरता जैनी धरही ॥
दान पुण्य नहिं जहां निहारा । हृदयमें न होय उजियारा ॥
दाया कहां जहां नहिं दाना । बिना दान किमि हो कल्याना ॥
तप जप करि साधू कछु सुखिया । जैनी गूही दान बिन दुखिया ॥
जैन यती वह सीष सिपाई । जो ताहुके धन अधिकाई ॥
फूटे कूपमें धनबरु डारो । बिना पात्र मतिदान बिचारो ॥
पात्र बिना नहिं देत जो दाना । तिनके पात्र मिलै नहिं आना ॥
तिनके पात्र हैं साधू जैनी । भोजनदान तिन्है कछु दैनी ॥
घरघरते भिक्षा ले येई । एक ठौर भोजन नहिं लेई ॥
ताते जैनमें दानकि हानी । जीव दया सुख पावै प्रानी ॥
बिना दिये पावे किमि कोई । देन लेन चारो युग होई ॥
दान न करहिं बर्त बहु करही । करि करि बर्त भूखते मरही ॥
जो नहिं देहे सो नहिं पैहै । निश्चय भूखते प्रान गवैहै ॥