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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2087

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जीवधर्मपौध

( २००९ )

भक्ति नौधा कही प्रेम पौधा यही बृद्धि विन सृद्धि नहिं यार आवै ।
यार चीन्हा नहीं प्यार कीना वृथा नाद अरु नृत्य कह गीत गावै ॥

इति श्रीधर्मव्यौरा

अथ वेदधर्म व्यौरा

दोहा—सतगुण सबमें श्रेष्ठ है, सतगुण विष्णु देव ।
सतगुणकी साखा गहे, लहे अगमको भेव ॥

चौपाई

सतगुनको सेवै बैरागी । तन मनते प्रभु सेवा लागी ॥
चार संप्रदा सगुण उपासी । नौधा भक्ति गहे सुखरासी ॥
भाव भक्ति प्रभु प्रतिमा पूजा । राम कृष्ण सम और न दूजा ॥
कोई बाल रघुपति कर ध्याना । कोई कृष्ण शिशु सेव प्रमाना ॥
नाना भांति सेव जिवधारी । लक्षण जानकी औध विहारी ॥
गान करहि बहु साधु समाजा । नादनृत बाजहि बहु बाजा ॥
धर्म वैष्णव परम सोहाई । दान पुण्य अति उज्ज्वल ताई ॥
गृह आश्रमी भाव भल धरही । सन्त गुरुकी सेवा करही ॥
वेद धर्मकी बात घनेरी । जहैंतहैं कविकृत मिश्रित हेरी ॥
ताते शुद्ध न व्यौरा लहिये । जो जिहिभाव सोई गति गहिये ॥
पौरानिक बहु कथा कहानी । शुद्धाशुद्ध जत्त विहरानी ॥
व्यास आदि ऋषिसुनि बहुतरे । जो जेहि भासा सत्यसो टेरे ॥
केते पंडितन ग्रंथ सँवारी । व्यासनाम धरि जत्त प्रचारी ॥
पुरुष प्रमानि बचन प्रमाना । सो विधि गहे भर्मभय भाना ॥
झूठ साँच जो कछु जगमाँही । निश्चय किये सत्य दरसाही ॥
झूठकी जबही झुठाई जाना । तब तेहि त्यागहि पुरुष सयाना ॥

इति वेदधर्म