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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2052

( १९७४ )

बोधसागर

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अंधी आंख निरंजन जूझे । विन देखे मुनि सब कछु बूझे ॥
ताते साधु प्रथम दृग बांधे । पीछे मन इंद्दीको साधे ॥
श्रवणको ऐसे कीजै दमना । अनमुनती बातें मति मुनना ॥
चुगली चाई निंदा वानी । सुने न श्रवण जीव जो ज्ञानी ॥
महा प्रबल इंद्दी हैं येही । जीवहि दुःखसुख व्यापे जेही ॥
गुरुपदेश कि कथा बताया । जीयत कैदी हाड तोडाया ॥
देखन ताहि जुरे नारीनर । एक गर्भिणी रहे तिहि ठाहर ॥
कैदी हाड लगा जब टूटे । निरखि गर्भिणी धीरज छूटे ॥
फिर देखी जब लोग लोगाई । सबही निजुनिजु भौन सिधाई ॥
निजघर जाय गर्भिनी बाला । कैदी सुरति कीन कछु काला ॥
मुनि ताको दोन्हो बिसराई । गर्भ कि थित सरनता पाई ॥
जन्मौ पुत्र तिहि औसर नारी । ता शिशुकी यह दशा निहारी ॥
कैदी अस्थि टुटी रह जेतो । बालक हाट टुटा सब तेतो ॥
हस्पताल सो शिशुले गयऊ । बीसवर्ष लो जीअत रहेऊ ॥
टूटा हाड़ बाल सो जीया । औषध ताहि न कछु गुनकीया ॥
मातु दृष्टि बालक दुःख पाया । गर्भहि निजु हाड़ तोड़ाया ॥
ऐसो नैन महाबलवाना । व्यासदृष्टि सुत तीनउपाना ॥
ऐसहि श्रवन प्रबलकहि गानो । एकबारकी कथा बखानो ॥
बंधा परा रहै जिहि ठाई । एक कलावत तहैं चलि आई ॥
गावन और बजावन लागा । सुनते बौरा मन अचुरागा ॥
बौरा रागको भेदी रहई । मुनि सुर ताल प्रीति अतिगहई ॥
परे परे निज अंग हलावै । ज्यों सुरताल कि गतिसुनि पावै ॥
परे परे निज अंग हलावै । खाट से खोलि दियौ पुनि वाको ॥
गुंगे बहिरे चंगे होई । श्रवण नयन हारे ते जोई ॥