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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९७५ )

प्राण देत मृग मधुरीबानी । ऐसहि प्रबल नासिका जानी ॥
इंद्री सकल अकलको हरही । ले सब जिव भवसागर भरही ॥

इति नेत्र श्रवण दमन

अथ हाथ पांवको दमन-चौपाई

उत्तर कर्म करनते कीजै । काहूको मति दुःख कछु दीजै ॥
पंथमें पाहन कंटक होई । करते दूर डार गह सोई ॥
दान पुन्य हाथन ते करिये । दुःखी दीनको सुखते भरिये ॥
मन्दे कर्मन हाथ उठाये । परधन परतिय दिस न चलाये ॥
चरननको यह कर्म बखाना । हरितीरथ सतसंगत जाना ॥
संतदरस रोगी सोगी पह । यथा योग चलके दुःखदलतह ॥
हरुये हरुये महि पग धरई । देखत चले न जिव कोइ मरई ॥
लाखन जिव पायनतर आवै । दाया करिके तिनहि बचावै ॥

इति हाथ पांवको दमन

अथ श्रेष्ठ पुरुषनकी सभा प्रवेश वर्णन-चौपाई

श्रेष्ठ सभामें जब पग दीजै । तहैं सब कर्म विचारते कीजै ॥
सभामध्य जेहिँ औसर पैठे । आज्ञा पाय तहां तब बैठे ॥
त्रिन बोले नहिँ बोलो बोला । बिन पूछे कछु भेद न खोला ॥
बुद्धि विरुद्ध न बोलो बानी । जाकी कोई प्रतीत न आनी ॥
बहुत बड़ाई अस्तुति छोड़ो । निंदा चुगुलीते सुख मोड़ो ॥
कबहुँ न निजगन बुद्धि सराहा । दुःखमतिभाषो सभा उच्छाहा ॥
ऐसो वचन कहो जनि ताही । मनभायक नरनायक नाही ॥

इति सभाप्रवेश

अथ मद्यमांस अभक्ष्यवर्णन-चौपाई

मद्य मांस भक्षमलिनबखानी । ताहि न ग्रहन करे नर ज्ञानी ॥
निज निजहृदय विचारो येहा । मल अरु मूत्र कि जेती देहा ॥