कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९७३ )
विद्या होय विनय संपन्या । ता पंडितको कहिये धन्या ॥
विद्या पढ़ि अभिमान भुलाना । सो जिव कीनो यमपुर थाना ॥
रसना सब संशयको छेदा । परमपंथको पावै भेदा ॥
रसना द्वार ज्ञान गुन आवै । रसना द्वार अगनि गति पावै ॥
इति रसना
अथ नेत्र और श्रवणका दमन—चौपाई
निज दृग दमन करो यहि लेखे । अन देखनी वस्तु मति देखे ॥
गुप्तस्थान मनुष्य पशु केरा । अति विशेष नहिं तादिशहेरा ॥
नरपशु परदा देख न जैसो । परे कुवानि जाहिमें ऐसो ॥
काल पाय निज दृष्टि गवावै । सो अवश्य अंधा है जावै ॥
जो परिच्छिद्र निहारन हारे । दुःखी होहिविन सुमति विचारे ॥
करता कृत निज दृष्टि निहारी । प्रभुहि सराह जीव तप भारी ॥
काम अरु कोध कुदृष्टि न हरे । सहज सुभाव नैन निज फेरे ॥
कामदृष्टि परतियपर डाले । जनु मैथुन करि धर्महि चाले ॥
निज पत्रिका लिखत जब कोई । ताहि न पढ़ो न निज दृगजोई ॥
जब तिय संग अनंग बिहारी । तब न गुप्त अस्थान निहारी ॥
जौ तादिश तेहिकालमें देखे । जन्मे पुत्र अंध यहि लेखे ॥
नैन न माह निरंजन थाना । स्वसंवेद इमि करे बखाना ॥
दृगन सपक्षी माह बसेरा । भोग हेत निज नैनन फेरा ॥
भोगे भोग दृगन आसीना । ताको छल नहिं कोई चीन्हा ॥
मन चंचल नैनन चपलाई । मन थिर हो तिनकी थिरताई ॥
नेत्रनमें है यमको बासा । सोइ जीव गल डारे फांसा ॥
जब जिव रोग सोग तन छावै । सबही अंग छीन है जावै ॥
नैन होहि कबहु नहिं छीना । सदा एकरस देखी पीना ॥
कैसहु कुशित रोग मल घेरी । ज्योति अघट्ट निरंजन केरी ॥