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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1992

( १९१४ )

बोधसागर

६

सत्य पंथ पावे परखि, तब तेहि सतगुरु भेंट ॥
जबलों नहि सतगुरु मिले, तबलों ज्ञान न होय ।
ऋद्धि सिद्धि तपते लहै, मुक्ति न पावै कोय ॥

अथ जीवको सत्यस्वरूपी देह और ज्ञानको लोप होना
और स्थूलदेह और संसारको भासना और
नानाप्रकार की सृष्टिको फुरना और
कर्मधर्मको विस्तार वर्णन ।

चौपाई

जीव धर्म बरनो अब सोई । सब भ्रम भासजाय जिहि खोई ॥
मोह रैन जग सोवन हारा । स्वप्नरूप यह जग विस्तारा ॥
नींद गई कछु दरसै नाही । सबही भर्म भास मिटि जाही ॥
छूटे सकल कालको फंदा । ज्ञान पाय जिव होय अनंदा ॥
जेते धर्म धर्म कोइ माहीं । जीव भर्म सबही ये आही ॥
सत्य असत्य सकल है माया । माया सब मिथ्या बतलाया ॥
मायाते सब काया जागी । तनमनधन उपाधि संगलागी ॥
जब अभाव कायाको होई । माया सबही जाय बिगोई ॥
प्रथहि सत्यरूप जिव रहेऊ । कच्छी देह बहुरि सो गहेऊ ॥
जिहि कारन सतरूप लोपाना । स्वसंवेदमें प्रथम बखाना ॥
अहंकार कर निरखि निकाई । ताते अपने रूप गवाई ॥
अपने रूपसे जब सो भटका । अतिशय दुःखद्वन्द्वमें अटका ॥
काल स्वरूपी है हंकारा । ताते प्रकट काल बरियारा ॥
काल कराल सोई अन्याई । सकल जीवको धरिधरि खाई ॥
यही जीवको बंधन कीने । भवसागरमें गोता दीने ॥
जाको हिय हंकाराते जूटे । निश्चय शीश तासुको टूटे ॥
अहंकार कह तीन प्रकारा । द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥