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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1932

(१८५४)

बोधसागर

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कहाँसे रंग यह आया । न काहूँ मोहिं बतलाया ॥
सुरति बहि रंगकी प्यारी । पपरा भये हैं वनवासी ॥
न आवे हाथ वह करनी । सिधारो जाय गुरु शरनी ॥
मुझे मुर्शिद मेहर करके । मुरीदी मन सिखाया है ॥
किताबें खोल दिल अन्दर । हकीकत निज बताया है ॥
कि है कोई गैबका वासी । दिखावे खेल परकासी ॥
बसावैं गैबका खोरा । मिटावे भर्मका फेरा ॥
अचम्भौ देश है न्यारा । लखे कोई नामका प्यारा ॥
दिया जिन प्रेमका प्याला । सोई हैं संत मतवाला ॥
कि निशिदिन मोह ना भूले । विरहकी झोंकमें झूले ॥
चरण कबीरको ध्यावे । इलाही ज्ञान भर पावे ॥

पद

हैली तीरथ जाय बुलाए । रे हरदम परब नहाये ॥
तीरथ कोटि अनन्त हैं रे गंग यमुन जहाँ दुई ।
मध्य सरस्वती बहत है रे नहाय निर्मल होवे ॥
ब्रह्म अग्निके घाटमें रे आगे शिवके लिंग ।
ताहुपे दछिना दीजिये रे बहुत सहसमुख गंग ॥
आगे कलालीकी हाट है रे चोखा फूल चुनन्त ।
बिन सदगुरु पावे नहीं रे कोई साधू जन पीवन्त ॥
शीश उतार धरणी धरे रे ऊपर धरले पाए ।
ब्रह्म अग्निके घाटपे रे इस विधिपर बेनहाए ॥
ऋग यजुर साम अर्थनवारे चारों वेदका ज्ञान ।
उनके वहां कहो कौन गति रे बांधे गांठ पखान ॥
चारों वेदको पिता है रे सूक्ष्म वेद संगीत ।
साहब कबीरजूके मुकद्दमेरे अविगतब्रह्म अतीत ॥