कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1931, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें६९
कबीर चरित्रबोध
( १८५३ )
सकती है और न काल किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित कर सकता है ।
जो कोई अपने गुरुसे सच्ची प्रीति करेगा उसका विश्वास अचल रहेगा और उसकी बुद्धि स्वच्छ रहेगी । विना गुरुके मनुष्यके हाथका जलपान पर्यंत उचित नहीं है ।
कबीर साहबका रेखाता
खलक है रैनका सपना । समझ दिल कोई नहीं अपना ॥
कहीं है लोभकी धारा । बहा जग जात है सारा ॥
घड़ा ज्यों नीरका फूटा । पतर जैसे डारसे दूटा ॥
ऐसी निर्जान जिदगानी । अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥
सजन परवार सुतदारा । सभी उस रोज हों न्यारा ॥
निकल जब प्राण जावेंगे । कोई नहीं काम आवेंगे ॥
निरख मतभूल तन गोरा । जगतमें जीवना थोरा ॥
तजो मद लोभ चतुराई । रहो निस्संग जगमाहीं ॥
सदा जिन जान यह देही । लगाओ सतनामसे नेही ॥
कटे यम कालकी फाँसी । कहें कबीर अविनाशी ॥
यथा
साँई यादमें रहना, नहीं यह जिन्द जावेगा ।
करो उस पीरकी बन्दगी, तुझे यारां लखाऊंगा ॥
बना है खाकका खेला, इसीमें खोज पावेगा ।
मुझे मुर्शिद मेहर मनशाल, गो दीदार पाया है ॥
मुझीको देखले परकट, किसी से न छिपाया है ।
कबीरा पीर है साचा, सकलमें आप छाया है ॥
यथा
समझ दिलसोच अबकीना । मुर्शिदसे पूछ नालीना ॥