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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1933

७१

कबीर चरित्रबोध

( १८५५ )

यथा

पण्डित सतपद भाजो रे भाई । जाते आवागमन नशाई ॥
ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहीं चीना आप कहाँते आए ।
एक योनिसे चार बरन भए ब्रह्मदेह कहा पाए ॥
बारह वेदी ब्रह्म बखान् स्वर औ शक्ति समानी ।
संध्या तर्पन तहां करलीना जहां कुशा नहीं पानी ॥
ऋग यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवेन सोई ।
सूक्ष्म वेदको भेद न जाने कयोंकर ब्रह्मन होई ॥
शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं ।
लखचौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥
नौगुण सूतसंयोग बखान् तिरगुण गाँठ दयानी ।
तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह वानी ॥
कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत जनेऊ सोई ।
पाखण्डकी गति सबही मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥

यथा

हिरवा गँवाए सास चली वारी धनियां ।

कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियां ॥
कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियां ॥
एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियां ॥
सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियां ॥
यह मत जानो हिरवा जरवा बनियां दूकान बेगानिया ॥
अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियां ॥
एक है चोर सकल जगमोंसे राजा रैयत रनियां ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो अलख है नाम निशानियां ॥