सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1880, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1880

( १८०२ )

बोधसागर

१८

जाति हमारी जगद्गुरु, परमेश्वर यह पंथ ।
दास गरीब लिखत परे, नाम निरंजन कंत ॥
रे बालक दुर्बुद्धि सुन, घट मठ तन आकार ।
दास गरीब दरदर लगे, बोले सिरजन हार ॥
तू मोमिनके पालुवा, जुलहेके घर वास ।
दास गरीब अज्ञान गति, एता दृढ़ विश्वास ॥
मान बड़ाई छाँड़िके, बोलौ बालक बैन ।
दास गरीब अथम मुखी, इतना तुम घर फैन ॥
कलियुग क्षेत्रपाल है, क्या भैरो कोइ भूत ।
दास गरीब विटंबना, गया जगत सब ऊत ॥
मनी मगज माया तजो, तजिये मान गुमान ।
दास गरीब सो बात कहि, नहीं पावेगो जान ॥
हे बालक बुधि तोरि गति, कौड़ी साखन भाँड ।
दास गरीबहि हदेसकरि, नहीं लेवेगे डाँड ॥
शाह शिकंदरके वधे, पग ऊपर तर शीश ।
दास गरीब अगाधि गति, तोर कहा जगदीश ॥
कान काट बूचा करे, नली भरत रे नीच ।
दास गरीब जहानमें, तुम सर जोरा मीच ॥
मरत मरत सबजग मुआ, लखै नऽस्थिर ठौर ।
दास गरीब जहानमें, तुमसा नीच न और ॥
नादविन्दकी देहमें, येता गर्व न कीन ।
दास गरीब पलक फना, जैसे बुदबुद लीन ॥
तिनकर तैसे बोलते, रामानन्द सुजान ।
दास गरीब कुजाति है, आखिर नीच निदान ॥
नीच मीच से ना डरे, काल कुल्हाड़ अशाश ।