कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
( १८०१ )
ऊत भूतको ध्यावना, पाखंड और परपञ्च ॥
रामानन्द अनन्द भये, काशी नगर मैझार ।
देश द्राविड छाड़िके, आये पुरी विचार ॥
योग युक्ति प्राणायाम करि, जीता सकल शरीर ।
तिरवेणीके घाटमें, अटक रहे बलवीर ॥
तीर्थ वरत एकादशी, गंगोदक अस्नान ।
पूजा विधि विधानसों, सर्वकलासों गान ॥
करे मानसी सेव नित, आत्मतत्त्वको ध्यान ।
षट पूजा आदि भेद गति, धूप औ दीप विधान ॥
चौदह सौ चेले किये, काशीनगर मैझार ।
चार सम्प्रदा चलत हैं, और हैं बावन द्वार ॥
पांच बरषके जब भये, काशीमाहि कबीर ।
दास कबीर अजीबकला, ज्ञानध्यान गुण थीर ॥
गुल भया काशी पुरीमें, अटपट बैन विहंग ।
दास गरीब गुणी थके, सुनि जोलहा परसंग ॥
रामानंद अधिकार है, सुनि जोलहा जगदीश ।
दास गरीब बिलम्बना, ताहि नवावत शीश ॥
रामानंदको गुरु कहै, तनसे नहीं मिलाप ।
दास गरीब दरस मये, पैयन लगी जो लाप ॥
पन्थ चलत ठोकर लगे, राम नाम कहि दीन ।
दास गरीब कसर नहीं, सीख लिये बरबीन ॥
आड़ा परदा देइके, रामानन्द बुझन्त ।
दास गरीब उलंग छबि, अघर डाक कूदंत ॥
कौन जाति कुल पंथ है, कौन तुम्हारा नाउँ ।
दास गरीब अधीन गति, बोलतही बलि जाउँ ॥
नं. ४९ बोधसा