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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1881

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कबीर चरित्रबोध

( १८०३ )

दास गरीब अदत्त है, तैं जो कहा जगदीश ॥
जड़िहों हाथ हथकड़ी, गले तौक जञ्जीर ।
दास गरीब परख बिना, यह वाणी गुणगीर ॥
परख निरख नहिं तोहिको, नीच कुलीन कुजात ।
दास गरीब अकल बिना, तू जो कही क्या बात ॥
हे बालक नीचा कला, तुमही बोलो ऊँच ।
दास गरीब पलक धरि, खबर नहीं हम कूँच ॥
महँके बरन खलास करि, सुन स्वामी परवीन ।
दास गरीब मनी मरी, मैं आजिज आधीन ॥
मैं अविगत गतिसे परें, चार वेदसे दूर ।
दास गरीब दशों दिशा, सकल सिंधु भरपूर ॥
सकल सिन्धु भरपूर हूँ, खालिक हमरो नाउँ ।
दास गरीब अजात हूँ, तेजि कहा बलि जाउँ ॥
जात पाँत मेरे नहीं, नाहिं स्त्री नहिं गाउँ ।
दास गरीब अनन्य गति, नहीं हमारे नाउँ ॥
नाद बिन्द मेरे नहीं, नहीं गोद नहिं गात ।
दास गरीब शब्द सजग, नहीं किसीका साथ ॥
सब सङ्गी बिछरू नहीं, आदि अन्त बहु जाहिं ।
दास गरीब सकल बसौँ, बाहर भीतर माहिं ॥
हे स्वामी मैं सृष्टिमें, सृष्टि हमारे तीर ।
दास गरीब अधर बसूँ, अविगत पुरुष कबीर ॥
अनन्तकोटि सलिता बड़ो, अनन्तकोटिधर ऊँच ।
दास गरीब सदा रहूँ नहीं हमारे कूँच ॥
पुहमी धरनि अकाशमें, मैं व्यापक सब ठौर ।
दास गरीब न दूरसा, हम सम तुल नहिं और ॥