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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1824

( १८ )

बोधसागर

जब लग सुर्त रही बाँही । कोइकोइ सन्त सो जानत आही ॥
टीका मुदित पूजै जब आई । यह पिण्ड तबही खस जाई ॥
सुर्त हंस ले गये लेवाई । महा पुरुषके दर्शन पाई ॥
महा पुरुषके चरण छुवाई । करै वन्दगी शीश नवाई ॥
महा पुरुष लिये अंक लगाई । सुर्त हंस नाम तिन पाई ॥
अपने समसर लिये लगाई । महा पुरुष सम शोभा पाई ॥
सुर्त हंस बिनवे कर जोरी । महा पुरुष सुनो बिनती मोरी ॥
भवसागर कडिहार रहाई । तिनके शब्द सुक्त हम पाई ॥
धन्य शब्द धन्य कडिहारा । तिनके शब्द मो हंस उबारा ॥
महा पुरुष चितवे चितलाई । भवसागर ते लेव सुक्ताई ॥
सुक्त होय सतलोकें आवै । छिन छिन गुरुके दर्शन पावै ॥
महा पुरुष शब्द उचारा । वै कडिहार हैं सुर्त हमारा ॥
जहां जहां सुर्त चित लाई । सोई हंस लोकको आई ॥
भ्रमें जीव होय जसमाहीं । तिन सनकी गहे जो बाहीं ॥
भ्रमें जीवको नारियर लेई । हस्त किया नरियरको देई ॥
हस्त किया नरियर जब पाई । भ्रमें लोक हंस लै जाई ॥
जाहि खानमें जीव रहाई । जहां जाय सुर्त समाई ॥
गई समय रही ठहराई । हंस उधार लोक ले जाई ॥
जो कडिहार हस्त किया पावे । महापुरुष के सुरत समावे ॥
हस्त किया गहे चित लाई । कहैं कबीर हंस लोक सिधार्द ॥

स्मरण सिंहासन बैठनेका

अंगन गहे गहनी तहां पुरुष चेतो सन्त बिचार ।
सिंहासन है पुरुष को सुर्तसों रोपो पांव ॥
जीवन पार उतारों तुम्हारे शिर नहीं भार ।
आदि पवन सों बैठो मूलशोध कडिहार ॥