कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसुमिरनबोध
( १९ )
कहैं कबीर धर्मदास सों, सत्यपुरुष चित्तराख ।
अमी अंक जो जानै, जासु जहाँ तत भाष ॥
स्मरण दल अर्पणका
अपोँ दिल चौकामें उत्तिम दल बनाय ।
कहैं कबीर धर्मदास सो सब अवगुण मिट जाय ॥
स्मरण पाषाण रखनेका
पान पुराण हाथकर लीन्ह। सब साहेबका सुमिरण कीन्ह। ॥
सत्य पुरुष बोले परवाना । वैठे पुरुष मध्य जो स्थाना ॥
रेखा लिखो पाषाणमें, अचित्य नाम घंट बोल ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, तब हँसा होय अडोल ॥
स्मरण नरियर रखनेका
नरियर नरियर नरियर खरी । नरियर मोरे सत्य कबीर ॥
औरसों नरियल मोर न जाई । पांच शब्द लै नरियरमोरेकबीर
धर्मदास आई ॥
स्मरण नरियर मोरनेका
जलदल लेके नरियर मोरा । सत्य शब्द गहतिनका तोरा ॥
मोरो नरियर ढुकुम कबीर । सत्य नाम गहि लागो तीर ॥
पुरुष नाम है अमी अमोल । नरियर मोरो खसमनिहोर ॥
स्मरण नरियर मोडनेका
अमी सींचके नरियर कीन्हों । सो नरियर धर्मदासको दीन्हों ॥
धर्मदास मृत्तु मण्डल आये । सकल सन्तमिलि मंगल गाये ॥
नरियर मोरकेसत्यमुक्तकोशिरनाये । निकुतनामलेहंस बचाये ॥
कहैं कबीर धर्मदास सों । नरियर मोरे वंश तुमार ॥
स्मरण तिनका तोरनेका
यह विरवा चीन्हे जो कोय । जरा मरण रहित घर होय ॥