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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1762

( ४० )

बोधसागर

सत्य कबीर शिष्य जब भयऊ । यह वृत्तांत तब सो सुनि लयऊ ॥
गोरखनाथके डरके मारे । बैरागी नहीं वेष सँवारे ॥
तब कबीर आज्ञा अनुसार । वैष्णव सकल स्वरूप सँवारा ॥
सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ । काशीनथ शीघ्र चलि आयौ ॥
रामानन्दको खबरि पठाई । चर्चा करो मेरे सँग आई ॥
रामानन्दकी पहिली पौरी । सत्य कबीर बैठे तिहि ठौरी ॥
कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ॥
प्रथम करो चर्चा सँग मेरे । पीछे मेरे गुरुको टेरे ॥
बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि बचन उचारी ॥

सत्यकबीर वचन--शब्द

कबके भये वैरागी कबीरजी कबके भये वैरागी ।
नाथजी हम जवसे भये वैरागी मेरी आदि अन्त सुधिलागी ॥
धुधूकार आदिको मेला नहीं गुरु नहीं चेला ।
जबका तो हम योग उपासा तबका फिरों अकेला ॥
धरती नहीं जदकी टोपी दीना ब्रह्मा नहीं जदका टीका ।
शिवशंकरसो योगी नहीं जदका झोली शिवका ॥
द्रापरकी हम करी फावडी त्रेताको हम दंडा ।
सतयुग मेरी फिरी दुहाई कलियुग फिरौ नौखण्डा ॥
गुरुके वचन साधुकी संगत अजर अमर घर पाया ।
कहैं कबीर सुनोहो गोरख जब हम तत्त्व लखाया ॥
जो बूझे सो बावरा क्या उमर हमारी ।
असंख्य युग परलय गई तबके ब्रह्मचारी ॥
कोटि निरंजन हो गये परलोक सिधारी ।
हम तो सदा महबूब हैं सोहं ब्रह्मचारी ॥
दश कोटि ब्रह्मा भये नौ कोटि कन्हैया ।