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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1763

आगमनिगमबोध

( ४१ )

सात कोटि शंभू भये मोरी एक पलैया ॥
कोटिन नारद होगये महम्मदसे चारी ।
देवतनकी गिनती नहीं है क्या सृष्टि विचारी ॥
नहीं बूढ़ा नहीं बालक नहीं भाट भिखारी ।
कहै कबीर सुन गोरख यह उमर हमारी ॥
अविध्व अविगतसे चलि आये कोई भेद सरम नहीं पाया ।
ना मेरो जन्म न गर्भवसेरा बालक है देखलाया ॥
काशीनथ जङ्गल विचडेरा तहाँ जोलाहे पाया ।
माता पिता मोरे कछु नाहीं न मेरो गृहदासी ॥
जुलाहाको सुत आनिकहाया जगत करत है हाँसी ।
धड नहीं मेरे गगन कछु नाहीं सूझै अगम अपारा ॥
सत्य स्वरूपी नाम साहेबको सौहै नाम हमारा ।
अधरद्दीप नहीं गगन गुफामें तहँनिजु वस्तु हमारा ॥
ज्योतिषरूपी अलख निरञ्जन सो जपै नाम हमारा ।
हाड चाम लोहू नहीं मोरे हौ सतनाम उपासी ॥
तारन तरन अभै पददाता कहै कबीर अविनाशी ।

गोरखवचन

कौन छुरा कौन पानी गुरु मूँडै कौन बानी ॥

सत्यकबीर वचन

शब्द छुरा निरञ्जन पानी गुरु मूँडै निरबानबानी ।

गोरखवचन

कौन दर कौन दरवेश कौन गुरुने मूँडै केश ॥

कौन पुरुको सुमिरी नांव मांगो भिक्षा भांडो गांव ॥

सत्यकबीर वचन

मन दर पौन दरवेश गुरु गोविंदने मूँडै केश ॥

अलख पुरुषको सुमिरो नांव मांगो भिक्षा तारो गांव ॥