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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1761

आगमनिगमबोध

( ३९ )

सुर नर सुनि कोई भेद न पावै पावै संतगंभीरा ॥
वेद कदापि पार नहिं पावै ऐसे मतिके धीरा ।
कहै कबीर सुनो रामानन्द दोनों दीनके पीरा ॥

चौपाई

रामानन्द कबीर कहानी । जक्तमाह बहु विधि विहरानी ॥
कछु मैं सूक्ष्म लिख्यौ बनाई । कीरति जासु जक्तमें छाई ॥
सत् कबीरको चरित अनेका । सो कछु इहां लिखौ नहिं एका ॥
केते परचा गुरुहि देखाई । तब ताके हिय निश्चय आई ॥
मैं घनघोर गुष्ठि गुरु पाही । अगम ज्ञान सुनि बोले ताही ॥

रामानंद वचन

दोहा-मैं जाना तुम जोलहा, मोहि पडा बड घोष ।
मूल दिशा मोहि देव कबीर, जीवत आवै संतोष ॥
करता तुम हो साधू हो, सत्य कबीर है देव ।
तनमन तुमको अपिहों, करह दीक्षा मोहि देव ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

सारखी-काल करन्ते आज कर, आज करंते अब ।
औसर बीता जात है; व्यौहार करोगे कब ॥
काल करंते काल है, मोहि भरोसा नाहिं ।
यह तनं काचा कुम्भ है, विनशि जाय छनमाहिं ॥
घडी पलकको सुधि नहीं, करो कालको साज ।
काल अचानक मारि है, ज्यों तीतरको बाज ॥

चौपाई

योगी गोरख नाथ प्रतापी । तासुतेज पृथ्वी पर व्यापी ॥
काशी नग्रमें सो पग परही । रामानन्दसे चर्चा करही ॥
चरचामैं गोरख जय पावै । कंठी तोरे तिलक छुडावै ॥