कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अपर सिद्धपद वेद जो होई। तासु अर्थ बोधक है सोई ॥
यास्क मुनीश्वर कथे बखानी। नाम निरूपन निर्णय ठानी ॥
आदित्य आदिक अरु बहुतेरे। रचित निरुक्त शास्त्र तिन केरे ॥
पंचम पिंगल कीन बखाना। पिंगलमुनिरचि छंद विधाना ॥
छटये ज्योतिष कालको ज्ञाना। आदित्यादिक गर्ग बखाना ॥
इति चार उपवेद
अथ अठारह पुराणोंके नाम-चौपाई
ब्रह्म बहुरि वयवर्त बखानो। बावन अरु ब्रह्मांड प्रमानो ॥
मार्कण्डेय भविष्य कहावै। नारद विष्णु पुराण बतावै ॥
गरुड बराह अरु पद्म गनीजै। भागवत मीन वो कूर्म कहीजै ॥
लिंगो वायु पुराण बताया। फिर अस्कंधो अग्नि कहाया ॥
इति
अथ शास्त्रके अठारह प्रस्थान वर्णन-चौपाई
शास्त्रके हैं प्रस्थान अठारा। या विधि तिनको नाम उचारा ॥
चार वेद उपवेद हैं चारी। वेदनके षट् अंग विचारी ॥
धर्मशास्त्र मीमांसा न्याई। चौथे पुनि पुराण बतलाई ॥
उप पुराण पौराण अनेका। अठारहेंकी नियम न एका ॥
स्मृती महाभारत रामायण। मंत्रशास्त्र नाना विधि गायन ॥
वाम तंत्र देवीके राखा। नारद पंचरात्र पुनि भाषा ॥
देव अराधन विधि बहु भनते। जक्त कार्य ताते भल गनते ॥
इति
अथ चारवेद को बाद वर्णन-चौपाई
प्रथम कहै ऋगवेद बखानी। निराकार परमेश्वर मानी ॥
निरलेपो सो अलख अगोचर। निरालंब सो जान ब्रह्मवर ॥
द्वितीय अथर्वण भाषत होई। निरालम्ब निलैप न कोई ॥