कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
सने चार प्रकार नाम धर । घोढचढरथचढगजचढपद्मचर॥
असगुन सगुन बहुत विधिभाषा । क्षत्री धर्म सकल तह राखा ॥
तृतिये गन्धर्व वेद बताये । ताहि भरथजीने प्रगटाये ॥
नाद नृत्य सुर ताल अनन्ता । विविधि भांतिसे ताहि बंदता ॥
युक्ति अनेकन देव अराधू । निरविकल्प पुनि कथे समाधू॥
चौथे अर्थवेद विधि कहिये । नाना युक्ते ताहिमें लहिये ॥
नीति शास्त्र अरु अश्चारुढा । शिल्प सूष आदिक मतिगुढा॥
धन उपाय बहु विधि तहलहिये । अर्थ वेद यहि कारण गहिये ॥
द्रव्य उपाजन रीति बनाई । अर्थ वेद पुनि अस अर्थाई ॥
कसेहु निपुण होय नर जोऊ । भाग बिना धन लहै न कोऊ ॥
ताते अन्त कथे बैरागा । सब चातुरी वृथा इमिलागा ॥
चहुँ उपवेदको यह सिद्धांता । सब तजि हो विरक्त बुधवन्ता ॥
वेद उपवेद कि विधिमें पागा । अन्त मुख्य वैराग अरुत्यागा॥
इति
अथ चार उपवेद षट् अंगवर्णन--चौपाई
शिक्षा कल्प व्याकरण वरनो । पुनि निरुक्तियोतिषचितधरनौ॥
पिंगल सहित कहैं षट् अङ्गा । विविधि भांति भाषे परसंगा॥
प्रथमें शिक्षा शास्त्रमें कहेऊ । नाना भांति कि युक्ती गहेऊ ॥
वेदके शब्द न माह बखाना । अक्षरनके अस्थानको ज्ञाना ॥
पाणिनीय है ताके करता । युक्ति चातुरी बहु तहँ धरता ॥
द्वितीये कल्पके सूत्रन माहीं । वेद कि विधिसो कहै तहाहीं ॥
कर्मके अनुष्ठान विधि गायन । पाणिनि पातंजलि कात्यायन ॥
तृतिये कथे व्याकरण जोई । वेदको शब्दबोध तिहि होई ॥
पाणिनीय आदिक बहु तेरे । कर्ता सोई व्याकरण केरे ॥
चौथे निरुक्त शास्त्रके माहीं । ऐसी निर्णय कीनो ताहीं ॥