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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1732

( १० )

बोधसागर

नहीं निर्गुण नहीं सर्गुण कहेऊ । जो कोइ मरा मुक्त सो भैऊ ॥
जैसे पत्र वृक्ष ते टूटा । फेर न सो तरुवरमें जूटा ॥
ऐसो जीव मरा यकवारा । बहुरि नहीं ताते तन धारा ॥
तृतीय यजुर अस कहे बहोरी । इन दोनोंकी मतिभई भोरी ॥
सर्गुण ब्रह्म नरायण होई । क्षीर समुद्र शयन कर सोई ॥
दश अवतार सोई धरिलीनो । गोपीनके संग कीडा कीनो ॥
चौथेसाम कह पुनि मत अपना । यह सब जानो झूठ कल्पना ॥
नहीं सर्गुण नहीं निरगुण देवा । नहीं दृष्टि गोचरको भेवा ॥
सम्पूर्ण है ब्रह्म अखण्डा । तत्वमसी अद्वैतसे मण्डा ॥

इति

अथ षट्शास्त्रकी बादर्षणन—चौपाई

प्रथम मीमांसा शास्त्र आचारी । कर्म थापि निजु ज्ञान उचारी ॥
जो कछु लाभ जक्तसे कीना । सो सब जान कर्म आधीना ॥
कर्महि अधिष्ठान जिवकेरा । कर्मते करे जक्त में फेरा ॥
कर्म प्रवृत्त कर्म लय पावै । कर्महि दुखसुख जीव भुगावै ॥
भूत भग्य व्रत मानिक जोई । कर्म अधीन जान सब सोई ॥
अज हरि हर सनकादिक जेते । कर्म अधीन जान सब तेते ॥
कर्म अधीन ज्ञान अरु योगा । जो जस करे भोग तसभोगा ॥
कर्म स्वतंत्र सर्वे परगावै । जो जस करै सो तसफल पावै ॥
द्वितीय बाद वयशेष वदंता । कर्म नहीं जानिये सुतंता ॥
कर्मतो कालकि बसमें होई । काल पाय कर्मकरै न कोई ॥
जब कतहुँ परगात न होई । भोर कर्म तब करै न कोई ॥
जौ मध्यान न सन्द्या आवै । बिना काल को कर्म गहावै ॥
बाल कर्म ना हो तरुनाई । युवा कर्म नहीं शिशु करि पाई ॥
युवा कर्म करि सकै न बूढा । वृद्ध कर्म तरुनाई गूढा ॥