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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1729

आगमनिगमबोध

( ७ )

पुरुषते महातत्त्व प्रकटार्ह । पुनि हंकार इन्द्रीतत्त्व गार्ह ॥
प्रलयको घौस बहुरि जब आवै । इन्द्री तत्त्व सब तहाँ समावै ॥
जिहि क्रमसे जो दियौ देखाई । तिहि क्रम २ सब जाहि लुपाई ॥
पंचम शास्त्र पतंजल कहेऊ । वेद अथर्वणसे सो गहेऊ ॥
ऋषि पातंजलि ताहि बनाई । वर्णन सारुयशास्त्र सम तार्ह ॥
योग युक्ति तिहि माँह बखाना । ज्ञान द्वारते युक्ति प्रमाना ॥
छठे शास्त्र वैशेषिक भाये । मुनि कणाद कर्ता कहलाये ॥
वेद अथर्वणते गहि लीना । यह षट्शास्त्रको वर्णन कीना ॥

इति श्री षट्शास्त्र

अथ चार उपवेद वर्णन

दोहा-आयुर्वेद धनुर्वेद पुनि, गन्धर्ववेद बखान ।

अथर्वेद ये चार हैं, तिनकी निर्णय ठान ॥

चौपाई

प्रथमे आयुर्वेद करतारा । ब्रह्मा प्रजापति अश्वनीकुमारा ॥
धन्वन्तरि आदिक रच ताही । कामशास्त्र वेदादिक जाही ॥
द्वितिये धनुर्वेदके करता । विश्वामित्र नाम सो धरता ॥
ब्रह्मा परजापति से जोई । विश्वामित्र सिखे गुन सोई ॥
सकल युक्ति शिष कीन प्रचारा । परजा पालन कै व्यौहारा ॥
शास्त्र प्रहारकि युक्ति है तामें । युद्धकरनकी बिधि वह वामें ॥
आयुध दोय प्रकारके मुक्ता । एक है मुक्त अरु द्वितिय अमुक्ता ॥
तृतिये मुक्तामुक्त कहाऊ । यंत्र मुक्त चौथेको नाऊ ॥
हाथसे जो चक्रादि चलाये । ताको नाम मुक्त बतलाये ॥
तरवार आदि अमुक्त बखाना । बरछी मुक्तामुक्त प्रमाना ॥
बहुरि तीर आदिक अरु गोली । यंत्र मुक्त तिनको कहि बोली ॥
मुक्त आयुधको अस्त्र कहीजै । अरु अमुक्तको शास्त्र भनीजै ॥