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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1728

( ६ )

बोधसागर

जैमिनि मीमांसक रचताही । शिष्य प्रसिद्ध भये बहु बाही ॥
परमेश्वरहि अकर्ता जाना । जक्त अनादि अनंत बखाना ॥
ज्ञान मुक्ति सब कर्मके द्वारा । कर्मके बशी भूत संसारा ॥
मुक्ति होय जिव ज्ञानके मर्मी । ब्रह्मा होय करन भल कर्मी ॥
तृतीय शास्त्र वेदांत बताये । सामवेदेते व्यास बनाये ॥
एक ब्रह्म द्वितीया कछु नाहीं । स्वप्न समान जक्त दरशाहीं ॥
ब्रह्ममें जबही माया डोले । ताको तब ईश्वर कहि बोले ॥
ईश्वर तीन भाग पुनि भयऊ । रज सम तमगुननामसोकहेऊ ॥
जेते जक्त माँह व्यौहारा । यही तीन सबके करतारा ॥
कर्म रहितसो ब्रह्म बखाना । कर्म स्वरूप तीन ये जाना ॥
मायायुक्त भये जब तीनों । तिहि कारण ईश्वर कहि दीनों ॥
ब्रह्म अविद्या युक्त जो होई । ताको जीव कहे सब कोई ॥
त्रिगुणब्रह्म अरु जग जिवसारे । सबही एक स्वरूप विचारे ॥
भिन्न अविद्या करिके माना । द्वै शक्ती तिहि माँह बखाना ॥
यक विशेष शक्ति कहलाये । द्वितीये अबरनशक्ति बताये ॥
शक्ति विशेषते जग उपजाये । अबरन शक्ती ज्ञान दुराये ॥
ज्ञानके उदय मुक्तिपद धरही । वेदांती यह निर्णय करही ॥
चौथे सांख्यशास्त्र मत गाढा । ताहि अथर्वण वेदते काढा ॥
रचे ताहिको कपिल मुनीशा । सोउ अकर्ता कथ जगदीशा ॥
सबही रचना प्रकृति कराये । जक्त अनादि सदा यहिभाये ॥
काहू बस्तूको नाश न होई । करता में करतूत समोई ॥
द्वैविधि भाषे पुरुष महातम । जीव आतमा अरु परमातम ॥
पुरुष प्रकृतको जब हो मेला । होय सकल रचनाको खेला ॥
पुरुष पंगुला परकृत अन्धी । दोहु बिनन्हि जगरचना बंधी ॥
प्रलय कालतिहु गुन समताई । रचनामें सतगुरु अधिकार्ई ॥