कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1714, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १०४ )
बोधसागर
अखण्ड फनिमनी तिलक है, अक्षय वृक्ष है सार।
अमर महात्मा जानिकै, करैतिलकतत्त्वसार ॥
त्रिकुटी अग्रे मूल है, भुक्तुटीमध्यनिशान ।
ब्रह्मद्वीप अस्थूल है, अग्रतिलक निरवान ॥
अग्र तिलक शिर सोहै, बैसाखी अनुहार ।
शोभा अविचल नामकी, देखहुसुरति विचार ॥
जासु तिलक अस्थान है, तासु नाम अस्थीर ।
खंभ लिलाटै सोभही, तत्त्वतिलकगम्भीर ॥
संता अयनकी खानिहै, महिमा है निजुनाम ।
अक्षयनामतेहितिलकको, क्षयनहिं अक्षयविश्राम ॥
मध्यगुफा जहां सुरति है, ऊपर तिलकको धाम ।
अमर समाधि लगावै, अंग अंग अस्थान ॥
कंठी कंठ विराजै, उज्वल हंस अमान ।
मुख उज्वल चक्षु उज्वल, उज्वल दशा न होय ॥
जो उज्वल है भीतर, ऊपर उज्वल सोय ।
अंतर कपट मलीनता, ऊपर और न होय ॥
जौन भाव भीतर बसै, ऊपर बरतै सोय ।
( भीतर और न देखिये, ऊपर और न होय ) ॥
जौन चाल संसारकी, तौन संतको नाहि ।
डीभि चालु करनी करे, संत कही नहिं ताहि ॥
साधु सती औ शूरमा, ज्ञानी औ गजदंत ।
एतौ निकसि न बहुरे, जो युगजायै अनंत ॥
साधु चाल जो जानिहै, साधु कहावैं सोय ।
बिन साधै साधू नहीं, साधु कहांति होय ॥