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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1713

शवासुआर

( १०३ )

काया परिचय जानिके, पकरै हठ कडिहार ।
नाव लगावै घाट कह, खेइ उत्तरे पार ॥
पश्चिम लहर जो गावै, नाव लगावै घाट ।
उत्तरि पांजी सोधिके, तब पावै निज घाट ॥
चंद उदय जब होत है, सूर्य अस्त बलहीन ।
इहै लगन है आदि की, जैसुनिकरसुरलीन ॥
जलरंग महलमें जाई रहै, करै जाइ विश्राम ।
सतगुरु शब्द बतावहि, तब पावै निज धाम ॥
अन्तकी राह बराइके, चले आदिकी राह ।
आसन पावै लोक महँ अक्षय वृक्षकी छाँह ॥
धर्मदास हंसनके नायक, माथै राखहु नाम ।
अब हम चले लोक कहँ, तुम जाय करौ विश्राम ॥

चौपाई

स्वेत मिठाई उत्तम पान । सत्यबचन भाषहु प्रमान ॥
आरति करी कीन्हेउ भाऊ । नरियर मोरपांच मिलिपाऊ ॥
भक्तिभाव कीन्हेऊ बहुभांती । सतगुरु दूलह संत बराती ॥
शब्द सुरति ते गाँठि जुरावहु । भावर की बंदन पहिरावहु ॥
तिलकबन्दन बहुविधि कीन्हेउ । पांचसाधुमिलिआशिष दीन्हेउ ॥
पञ्च जने मिलि अर्पण कीन्हेउ । डरत तिन्है पुहमीमें दीन्हेउ ॥

समय-डर पारस डर प्रेमगुरु, डर करनी डर सार ।

डरता रहै सो ऊबरे, गाफिल खासीमार ॥

तत्त्व तिलक तिहुँ लोकमें, सत्यनामनिज सार ।

जन कबीर मस्तक दिया, शोभा अगम अपार ॥

शोभा अगम अपार, पार बिरलै जन पावै ।

अमर लोकको जाय, बहुरि कबहुँ नहि आवै ॥