कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुञ्जार
( १०५ )
साधु कहावन कठिन है, ज्यों खांडेकी धार ।
डगमग है तौ कटि परै, गहै तो उतरे पार ॥
साधू सोई जानिये, जो चले साधुकी चाल ।
परमारथ लागा रहै, बोले बचन रसाल ॥
संगति करिये साधुकी, हरै सकल तन व्याधि ।
नीची संगति असाधुकी, आठों पहर उपाधि ॥
निश वासर साधु मिलै, मिटै विषम तन पीर ।
तासु नेह नहिं छोंडिहौं, सदा सुफल तनथीर ॥
साधुनसों संगति करै, जागत सोवत हाल ।
तासु संगमै ऐ वरहों, ज्यों कर सदा रुमाल ॥
जाके हृदये सत्यहो, सोई सुकृतके साथ ।
साधु २ सोहावे ताहि, खोजि लेह नगमनीमाथ ॥
साधु न संकट सों परै अगमन हमही होय ।
दुर्जन मारि बहाइहैं, पला न पकरै कोय ॥
तन मन शीतल शब्दपर, बोलत बचन रसाल ।
कहै कबीर तेहि दासको, गांजि सकै ना काल ॥
ररा काग विष बोकरा, कूकर नाग मञ्जार ।
नाहर विषधर दूत, भूत वट औ पार ॥
सब कह बाधी कबीर, आन घाट बाटलै डार ।
बाट घाट बन औघट, मोहिं खसमकी आश ॥
मते चलौं कबीरके, कबहि न होय बिनाश ।
भागे यमदूत भूत यम, काल न तिनुका टूट ॥
हंस चले हैं लोक कहैं, काल रहा शिर कूट ॥
चौपाई
धर्मदास सुनो शब्द सन्देश । जाहि देहु ताहि मिटै अन्देशा ॥
जाके घट तुम्हरी सहिदानी । तहाँ प्रगट हम तुमहि समानी ॥