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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1695

शवासुखार

( ८५ )

शिष्यके हिरदैं गुरुके वासा । शिष्य रहैं गुरुचरण निवासा ॥
गुरु शिष्यसों अन्तर नाहीं । मन है एक देह दुइ ताहीं ॥
शब्द स्वरूप गुरुकर वासा । सुरति स्वरूपशिष्यकीआसा ॥
समय-गुरु समाना शिष्य महँ, शिष्य लियाकरि नेह ।
विलगाये विलगैं नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥

चौपाई

ताहिं गुरुसों सत्य जो कीजे । बाहर अंतैं चित्त ना दीजै ॥
जो गुरु शिष्य हृदय नहिं होई । तासों सत्य करै नहिं कोई ॥
गुरु बाहर शिष्य भीतर आवै । दुविधा धोखा काल तेहि लावै ॥
सत्य होय सो सत्यहिं जानै । गुरुकहँ राखि हृदयमहँ आने ॥
गुरु हृदये सो बसै निनारा । सत्य करत जाईं यमद्वारा ॥
गुरु शिष्यसों बाहर बसई । सत्य करत काल तेहि डसई ॥
गुरुकी मति अंतैं रहैं वासा । शिष्यकी मती गुरुके पास ॥
ऐसे गुरुसों सत्यजो करहीं । सेवा करत काल तेहि धरहीं ॥
शिष्य सयान गुरु अज्ञानी । धोखैं होइ दुनोंकी हानी ॥
गुरु शिष्यकी मति एकैं होई । सत्य करै तारै कुल दोई ॥
गुरुकी मति जो शिष्य न पावै । काज विसार चिंता मन लावै ॥
गुरुको भेद लखैं नहिं बानी । सत्य करै कुमती अज्ञानी ॥
नवका ऊपर बहुजीव चढावै । खेवा बिना पार नहिं पावै ॥
खेवनहार चीन्हि जब लेही । पाछै पाँव नउका पर देही ॥
खेवन हार चीन्हि नहिं पावै । नउका चढै सो मूर्ख कहावै ॥
सागर सुमति मुक्तिकी धारा । ममती न्याव ज्ञान कडहारा ॥
करै विवेक चोर औ साहू । बिना विवेक घाटलागुनकाहू ॥
चोर जानिके पाँव न देई । साधु जानिके पारहु जेई ॥
चोर साहूकर भाव बतावा । सागर नाव धार दिखलावा ॥