सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1696, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1696

( ८६ )

बोधसागर

चोरके नाव चढ़ै जो कोई । सागर पार कबहुँ नहिं होई ॥
साहुकी नाव होइ असवारा । सागर उतरत लाग न वारा ॥
सागर पार मुक्ति कर वासा । जो गुरु मिलैतो करै निवासा ॥
घर घर गुरु घरहि घर चेला । लालच बाँचै फिरै अकेला ॥
जैसे श्वान कामबश धावै । तृष्णा बाँधै अंग लगावै ॥
तृष्णा मिटै गांठि जुरि जाई । पाछै शीश धुनि पछितार्ई ॥
एहि बिधि होइ दुवोजग भूटा । काल कलाधरि गहै न खूटा ॥
ऐसी सत्य करै जो कोई । धोखे जाय काल बसि होई ॥
गुरुकी करनी शिष्य जो पावै । तब सत्य करै सत्यलोक सिधवै ॥
समय-सत्य तो तासों कीजिये, जहवां मन पतियाय ।
ठाँव ठाँवकी सतीसों, कुलकलंक चढ़ि जाय ॥

चौपाई

अंकके मिटत कलंक मिटि जाई । अंकके रहत अकलंक न जाई ॥
अंक लिखा यम एहतन माहा । अंक मिटाइ देहु तेहि माहा ॥
नख शिख अंक लिखा यमराई । चौदह कला थाना बैठाई ॥
गुरुगमि शब्द जानि जो पावै । तब चौदह यमफन्द मिटावै ॥
एहि फन्दै सुर नर मुनि भूलै । देह धरी धरि सब जग झूलै ॥
चौदह काल विकार अन्याई । नर नारी घट रहै समाई ॥
भिन्न भिन्नके न्याय विलोवै । पारस निहार अन्तमुख गोवै ॥
प्रथम काल कामके अंगा । नख शिर व्यापै विषै भुजंगा ॥
चित्तभंग औ कुल व्यवहारा । लाज सनेह सकुच बटपारा ॥
आलस निद्रा रूप बरियारा । लालच लोभ मोह कर धारा ॥
विषय वास बसै बेकारा । इन्द्र चौदह मिलि भक्ति उजारा ॥
भक्ति प्रतीत शितल इन्हनासी । प्रेम बिगारि लगावहि फासी ॥
दया धीरज संतोष न आवै । सुमति सहज लै दूरि बहावै ॥