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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1694

( ८४ )

बोधसागर

परदै रहै लाजकी बैधी । परदा साथ कालकी सँधी ॥
गुरुसों कपट करी धन लीनी । सुरति निरति विनुकाल अधीनी ॥
कामिनी परदा सति सो ठानै । लाज लिये मुख बात न आनै ॥
गुरुके परदा बांचै नाही । बूढै विषम सरोवर माहीं ॥
गुरुसम मात पिता सो नाही । गुरु विन बूढि सरोवर माहीं ॥
गुरुसम मात पिता नहिं होई । मात पिता गुरु जानहु सोई ॥
समय-जे कामिनि परदै रहै, गुरुमुख सुनै न बात ।
ते कामिनि कुतिया भई, फिरै उधारै गात ॥

चौपाई

लोकलाज पति सबै बिचारा । लक्षण लक्ष्य सबै निरधारा ॥
जाको होई भक्तिकी आसा । सतगुरु चरण करै विसवासा ॥
तजै गर्भ जो निकसी आसा । पावै सतगुरु चरण निवासा ॥
यमको अन्त जानि जो पावै । भवसागर तब साधु कहावै ॥
सतगुरु चरण गहै चित जानी । मेट कुटिल कर्मकी खानी ॥
सन्त कहावै अन्त सम्झारी । चौदह काल चरण चित धारी ॥
चौदह यमकर सकल पसारा । सतगुरु शरण होई निरुयोरा ॥
चौरासी कर करम अपारा । विनु सतगुरु का करै उबारा ॥
गुरु करता गुरुदेव नरेशा । विनु गुरुगम सब भेद अनेशा ॥
गुरुसे दूसर और न कोई । जाते मुक्ति पदार्थ होई ॥

समय-गुरुकरता कर मानिये, रहिए शब्द सभाय ।

दर्शन कीजे बन्दगी, सुनै सुरति लगाय ॥

चौपाई

आगे मिलै बन्दगी कीजै । पाछे चरण कमल चित दीजै ॥
शब्द सुरति मिलि रहे समाई । ताप तपै नहिं सुरति समाई ॥
एकै देह एक अस्थूला । एकै भाव भक्ति कर मूला ॥