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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1682

( ७२ )

बोधसागर

गुरुपद छांड़ि अनत नहिं जाई । खुशै अमी रस पीवै अघाई ॥
समता धीर होइ जेहि गाता । तेहि यमकबहि करै नहिं घाता ॥
गुरुगम भेद बूझि सब पावै । ममता मोह सबै विसरावै ॥
समय-गुरुकी आज्ञा आवै, गुरुकी आज्ञा जाय ।

कहै कबीर सो हंस भए, बहुबिधि अमृत खाय ॥

चौपाई

क्षीण अधर औ नेत्र विसाला । गुरुगमी बोले शब्द रिसाला ॥
जो कोई तपत ताहि पहुँ आवै । अमृत सींचिके ताहि जुडावै ॥
पावै अमृत हर्षित होई । मोह महाबल जाइ बिगाई ॥
शब्दकी परच बोले बानी । तन अभिमान विसारे खानी ॥
तत्त्व तमाशा निश दिन देखै । भाव अभाव एक करि लेखै ॥
आसन मारि समाधि लगावै । एक पग संपुट पाछे लावै ॥
उलटी बाँह शीशपर राखै । पूर्णतत्व अमीरस चाखै ॥
पलकन मारै राखै साधी । तिरवेणी तट राखि समाधी ॥
अमर महातम तत्वहि राता । दशै सूख सागरके दाता ॥
ज्ञान महातम तबही पावै । अमर समाधि एकपल लावै ॥
तबही मिटै काल करदाऊ । दुविधा दूसर सब विसराऊ ॥
अमर समाधि महा फल पावै । जमदारुन तेहि शीश नवावै ॥
करपग कोमल रोग न व्यापै । काल कला तेहि देखिके काँपै ॥
अखंड मंडल गुफाके तीरा । दरशै ज्योति अखंडित धीरा ॥
जो देखै तो प्रकटै चोरा । देखे बिना ज्ञान होय भोरा ॥
तत्व समाधि लगावै जानी । उपजै ज्ञान अमी रस खानी ॥
सत्य सुकृत पग परसै जाई । रोग न व्यापै काल न खाई ॥
तत्व तमासा गुरुमुख देखे । तत्व छाड़ि निहतत्व बिबेखे ॥
तत्व समाधि करै नित पूजा । सत्य सुकृत तजि और न दूजा ॥