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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1683

शवासुखार

( ७३ )

पाँवके ऊपर पाँव चढावै । हाथ फेरिके संपुट लावै ॥
संपुट शीश छुआवै जानी । निरखै अरध उरधकी वानी ॥
कसनी कसै बहत्तर डोरी । सुरति शब्दसों राखै जोरी ॥
अधर अवाज लखै निरबाना । राग छतीसों सुने वँधाना ॥
सुरली टेर अर्ध धुनि होई । ज्ञानगुफा चढ़ि निरखेहु सोई ॥
सुनत अर्ध धुनि उन मुनिराता । बूझै आदि अन्तकी बाता ॥
मन मकरंदी के गुण पावै । मगन होइ चंचल नहिं धावै ॥
मन सर होई सरे सब काजा । छोंडे कपट शीश विचुराजा ॥
नख शिश मनै बियापै सोई । मन चीन्हे मन आपै होई ॥
यह मन शक्ती यह मन सीवा । यह मन पांच तत्त्वको जीवा ॥
इह मन लेकै उन मुनिरहै । तीन लोककी बातें कहै ॥
ऊन मुनीमें रहै रहावै । ताकर हंस काल नहिं पावै ॥
ऊनमुनी महीं लावै तारी । अङ्गमें महलमहँसुरतिबैठारी ॥
उनमुन महीं जो वासाकरै । अगम महलमें सुरति लै धरै ॥

समय-उन चढी आकाशको, गई गगनपर छूटि ।

हंस चले जो जात हैं, रहे शिर कूटि ॥

उन मुनीमें धर्मदासबसै, बंक नाल गहिजोर ।

शिर ऊपर सतशुक्ति तहै, तहां शीत शब्दकी डोर ॥

चौपाई

उनमुनी सांची सुरति है बासा । धर्मदास गहि राखहु पासा ॥
सोहं सार मूल धुनि राता । तासु नेह मिले दाता ॥

समय-हंसा सोहंग मान करै, निकसि खेल मैदान ।

तहां सुरति बैठारिकै, नित प्रति लावै ध्यान ॥

चौपाई

अमर आसन करौ बिचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥