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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1681

श्वासगुञ्जार

( ७१ )

तापर काल लिखै सहिदानी । बोलत धीर हृदय कुबानी ॥
लक्षण भेद कहो सहिदानी । कालसभा भयभीत निशानी ॥
कालकला निरखेहु बहु भांती । करहु विचार दिवस औ राती ॥
कृपण होय माया नहिं छाडै । जोरी जोरी बरनि महेँ गाडै ॥
आशा रहे तहां लपटाई । मुक्ति होय नहिं यमघर जाई ॥
देह ताहि विष गंजित पाना । करम रेख सब देह पयाना ॥
नेत्र बिलोन मसा मुख होई । करत कल्पना जाय विगोई ॥
लवा शीश होय मुख छाही । हृदय कठोर दया नहिं ताही ॥
मध्य कपोल होइ तिल खानी । बांये तत्व लै बोले बानी ॥
बांये विभौ मासा जो होई । दहिने दारुण तेज समोई ॥
बांये विभौ ताहिके होई । अंत चले जिव सर्वस खोई ॥
गहरी चितवनि मुख चतुराई । लंपट चोर होइ दुखदाई ॥
छोटी गर्दन राजस भारी । मिथ्या बोले होय खुआरी ॥
ता घट जीव दया नहिं होई । बोधत ताहि काल पुर रोई ॥
जान ऊपजै कुमती शरीरा । तेहि जनि देहु मुक्ति बलवीरा ॥
एक समय पान जो पावै । आपु जाइ संगति बगरावै ॥
विषयहि लम्पट होय जुआरी । इनते होइ है पन्थ खुआरी ॥
शब्द पेलीजानि पांव छुआवहु । महाविकार तन कछहि पावहु ॥
ताते आगम कहौ पुकारी । कुमति छुडाय पान निरुआरी ॥
हर्षित वदन रहे दिनराती । गुरुसों प्रीति करै जेव स्वाती ॥
सोंपैही सदा स्वाती आसा । उपजै मुक्ती ज्योति प्रकासा ॥
रहनि गहनि बूझे करजोरी । दीन्हेहु ताहि शब्दकी डोरी ॥
गुरु सन्मुख होइ सेवा लावै । काम कोध ममता बिसरावै ॥
सदा अधीन रहे गुरुआगे । पावै शब्द सहज अनुरागे ॥