कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1680, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७० )
बोधसागर
समय-निडुरीनिडुरै नाचै, चारिउ अंचल छोरी ।
धनी पियारी होइ रहै, यमसो तितुका तोरी ॥
चौपाई
इहि विधि मुक्ति गहे जो कोई । ताकौ आवागौन न होई ॥
आवागौन विचारै जानी । काया कष्ट होइ नहि हानी ॥
सतगुरु शब्द जो लागा रहै । निकसि चरण सतगुरुको गहे ॥
तीन लोक नाद जय जाई । सतगुरुको पग रहै समाई ॥
तिसरी श्वासा साधै जानी । कुल अभिमानमिटै सबखानी ॥
नरको लक्ष पारख करि लेहूँ । पाछै वाह ताही कइ देहूँ ॥
चंचल चपल कुटिल तन होई । पान पावै तन जाय बिगोई ॥
ताको लक्षण नर्ककी खानी । बोधत दुई दुवोंकी हानी ॥
राजा वरण तन बन्सी लावै । आप नष्ट होइ और नशावै ॥
जो वाकी संगति बैठे जाई । अपनी दशा ताहि पहराई ॥
सो सतगुरु जो होय सियाना । लक्षण देखि देइ तब पाना ॥
आगत पान धरै चितलाई । पाछे निर्णय शब्द बुझाई ॥
पानलेत चित हर्षित होई । चालु चले नहि दुर्मति खोई ॥
ताहि देहूँ गुरु पिपीलका । लक्षण हीन रेष होइ जिसका ॥
तापर अंक लिखे सहिदानी । काल कलाधरि देइ निशानी ॥
जैसा लक्ष जाहिपह होई । पान देहु तेहि तहाँ बिलोई ॥
भामत पौन लिखै तेहि माहाँ । दिटै इलाका गुरुको ताहाँ ॥
जाके होई सुमतीकी खानी । ताही देहु गुरुनाम निशानी ॥
राज वरण मुख शीतल बानी । ताघट होई ज्ञानकी खानी ॥
पूरी तत्त्व पान जो पावै । यमकी नाक छेदि घर आवै ॥
राजवर्ण होय क्षीण शरीरा । ता घट काल करे नहि पीरा ॥
राजबरण मुख गुंज चतेरा । सो जिव होय कालको चेरा ॥